Monday, 30 January 2017

भारतीय संदर्भ में संचार, शोध-अनुसंधान एवं भाषायी विमर्श




हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी एवं लोक भाषा के संदर्भ में 
संवाद का सेतु - भाषा मनुष्य मात्र एवं प्राणी मात्र के बीच संवाद का सेतु है। हम भाषा के माध्यम से अपने भाव एवं विचारों को अभिवयक्त करते हैं, दुनियाँ संपर्क साधते हैं, दूसरों से जुड़ते हैं और परिवार-समाज का ताना-बाना बुनते हैं। इस तरह सभ्यता-संस्कृति की विकास यात्रा आगे बढ़ती है। जीवन मथन से निकले सार को, शोध-अनुसंधान के निष्कर्षों को भाषा के माध्यम से ही व्यक्त कर इन्हें जनसुलभ बनाते हैं। भारतीय संदर्भ में संवाद एवं शोध-अनुसंधान की बात करें, तो हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत और लोकभाषा पर चर्चा समाचीन हो जाती है। 
 
हिंदीएक अद्भूत एवं विल्क्षण भाषा है। अपनी अंतर्निहित विशेषताओं के कारण हिंदी को देश की लिंक या संपर्क भाषा कहें तो अतिश्योक्ति न होगी। स्वतंत्रता संग्राम के दौर की यह संपर्क भाषा रही। गैर-हिंदी भाषी नेता तक इसकी पैरवी करते रहे। आज राष्ट्रपिता महात्मा गाँधीजी की पुण्य तिथि है, गांधीजी स्वयं आजादी के बाद इसको राष्ट्रभाषा बनाने के पक्षधर थे। लेकिन एक वर्ग के उग्र व हिंसक विरोध के चलते यह राष्ट्रभाषा न बन सकी और राजभाषा मात्र बनकर रह गई। हालाँकि विरोध के स्वर धीरे-धीरे धीमे पड़ रहे हैं। आज वैश्वीकरण के दौर में हिंदी बाजार की भाषा बन चुकी है और फिल्म, विज्ञापन तथा सोशल मीडिया के माध्यम से आज यह देशव्यापी प्रसार पा चुकी है। आप काश्मीर से कन्याकुमारी तक, राजस्थान से अरुणाँचल तक कहीं भी चले जाएं, हिंदी भाषा के आधार पर अपना काम चला सकते हैं। बोलने या लिखने में कुछ संकोच या दिक्कत होती हो, तो बात दूसरी है, अन्यथा हिंदी को समझते लगभग सभी लोग हैं।

हिंदी का विश्वव्यापी प्रसार - अपनी अंतर्निहित विशेषताओं के कारण, यह आज देश ही नहीं विदेशों में तेजी से विस्तार पा रही है। कितने विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जा रही है। फिजी जैसे देश की हिंदी राज भाषा है। कई देशों में प्रवासी भारतीयों की यह लोकप्रिय भाषा है। आश्चर्य नहीं कि हिंदी विश्व की शीर्ष चार भाषाओं में शुमार है। और एक आँकलन तो यहाँ तक कहता है कि आने वाले समय में हिंदी चीन की मेंडरीन भाषा को पीछे छोड़ते हुए विश्व की नम्बर एक भाषा बनने जा रही है।

अंतर्निहित विशेषता का मूल आधार है – इसका लचीलापन, इसकी पाचन शक्ति और सरलता पारसी हों या अंग्रेजी अथवा क्षेत्रीय भाषाएं, जिसके भी यह संपर्क में आती गईं, सभी के उपयोगी शब्द समाहित करती गई। हिंदी भाषी प्राँतों में इसके अलग-अलग स्वरुप मिलेंगे। अगर आप हिंदी के समाचार पत्र उठाकर देखेंगे तो हिंदी भाषी प्राँतों में हिंदी के भिन्न-भिन्न रुप मिलेंगे। अर्थात, हिंदी देश काल परिस्थिति के अनुरुप खुद को ढ़ाल लेती है। मेट्रोज में अंगेजी के साथ मिलकर खिचड़ी भाषा हिंग्लिश का विकृत रुप भी आप देख सकते हैं।

हिंदी की शक्ति का स्रोत इसका संस्कृत मूल है। हिंदी में संस्कृत मूल के तत्सम, तद्भव शब्दों की भरमार है। संस्कृत को देवभाषा कहा गया है। राष्ट्र की आत्मा इसमें वास करती है। श्री अरविंद के शब्दों में संस्कृत भारतीय ह्दय की कूँजी है। हर शुभ कार्य का आदि यहाँ किसी संस्कृत मंत्र से होता है, और अंत शांतिपाठ मंत्र से। वैदिक परम्परा में व्यैक्तिक उपासना हो या पारिवारिक यज्ञ या षोड्श संस्कार, अर्थात् सामाजिक पर्व-त्यौहार, संस्कृत हर स्तर पर अभिन्न घटक है। फिर आज के कम्पयूटर युग में संस्कृत को सबसे अधिक वैज्ञानिक भाषा का दर्जा प्राप्त है। विश्व-ब्रह्माण्ड का सकल ज्ञान-विज्ञान इसमें समाहित है। आश्चर्य नहीं कि विदेश में इस पर गंभीर शोध-अनुसंधान चल रहे हैं। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे यहाँ संस्कृत को लेकर शोध की वह गंभीरता नहीं है। लोकस्तर पर इसको लेकर गंभीर उदासीनता का भाव है। राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान जिस तरह से इस दिशा में ठो काम कर रहा है, इसके सुनियोजित प्रयासों से इस दिशा में गति आएगी, ऐसा हमारा विश्वास है। हमारा विचार है कि किसी भी ज्ञान-विज्ञान की धारा का शोध-अनुसंधान बिना संस्कृत के अधूरा है। अगर आपको विषय की गहराई में उतना है, उसका समग्र अनुसंधान करना है तो संस्कृत साहित्य में डुबकी लगानी पड़ेगी।
जब हम शोध-अनुसंधान व ज्ञान के प्रसार की बात कर रहे हैं तो हमारे विचार से हिंदी के साथ अंग्रेजी पर भी थोड़ा प्रकाश डालना जरुरी हो जाता है।

अंग्रेजी, बाहरी दुनियाँ से लिंक की सर्वसुलभ भाषा - आज का यह सत्य है कि अंग्रेजी विश्व की सबसे अधिक बोले जाने वाली प्रथम तीन भाषाओँ में एक है। चीन की मेंडरीन व स्पेनिश के बाद अंग्रेजी का स्थान आता है। अगर हम कोई शोध करते हैं और इसका विश्वव्यापी प्रसार करना हो, या हमें भारत के बाहर कदम रखना हो तो लिंक भाषा के रुप में अंग्रेजी हमारे लिए सर्वसुलभ है। कुछ हिंदी भाषी अंग्रेजी के प्रति घृणा व विद्वेष का भाव रखते हैं, जो हमारे विचार से उचित नहीं है। आपसी संवाद और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की भाषा के रुप में इसका अपना महत्व है। देश में ही गैर हिंदी भाषी अंग्रेजी बोलने वालों तक पहुँचने के लिए अंग्रेजी एक सेतु का काम करती है।
फिर कितनी ही भारतीय मेधाओं कश्रेष्ठतम् कार्य अंग्रेजी भाषा में सम्पन्न हुए हैं। कल्पना कीजिए, यदि स्वामी विवेकानन्द को अंग्रेजी न आती होती, तो क्या वे भारतीय धर्म-अध्यात्म का उद्घोष विश्व धर्मसभा में कर पाते। यदि श्रीअरविंद अंग्रेजी न जानते तो उनकी कालजयी रचना सावित्री सामने आ पाती। बैसे ही अंग्रेजी ज्ञान के बिना इसकी कालजयी रचनाएं, बिना अनुवाद के हम तक कैसे पहुँच पाती, जिनको पढ़कर हम आज ज्ञान के सागर में गहरी डुबकी का आनन्द ले पाते हैंइस संदर्भ में तो जितनी अधिक भाषाओं को हम सीख सकेंतना ही वेहतर है, लेकिन हमारे सिखने की अपनी सीमाएं हैं।

लेकिन अपनी क्षेत्रीय भाषा, मातृभाषा, लोकभाषा के प्रति तो अपना अनिवार्य कर्तव्य बनता है। क्योंकि लोकमानस से संवाद एवं लोकसाहित्य-संस्कृति में निहित ज्ञान-विज्ञान के अनुसंधान का यही माध्यम है। लेकिन आज नई पीढ़ी अपनी लोक भाषा से अलग हो रही है। घर पर ड़े उनसे हिंदी में बात करते हैं और स्कूल में टीचर अंग्रेजी में। यह स्थिति प्रायः हर प्राँत की है। हिंदी की आढ़ में अपनी देशी भाषा की उपेक्षा हो रही है और अंग्रेजी की आढ़ में हिंदी की। इस तरह के दबाव में कई क्षेत्रीय भाषाएं विलुप्ति के कागार पर हैं। परिणामस्वरुप नई पीढ़ी अपने लोक साहित्य के साथ लोक संस्कृति से कटती जा रही है, जो चिंता का विषय है। यदि किसी क्षेत्र की लोक भाषा लुप्त होती है, तो उस क्षेत्र की संस्कृति में निहित पूरा इतिहास एवं ज्ञान-विज्ञान लुप्त हो जाता है। जो भी व्यक्ति लोक भाषा व लोक संस्कृति को जिंदा रखने के लिए कार्य कर रहे हैं, उनके शोध प्रसाय सर्वथा वंदनीय हैं औऱ नई पीढ़ी के लिए प्रेरक हैं। ऐसे प्रयासों को हर स्तर पर अधिक से अधिक प्रोत्साहदेने की आवश्यकता है।

सारतः - 21वीं सदी में हिंदी का भविष्य तो उज्जवल दिखता है। देश के यशस्वी प्रधानमंत्री संयुक्त राष्ट्र सभा में हिंदी का ढंका बजा चुके हैं। फिर हिंदी बाजार की भाषा बन चुकी है। सारे अबरोधों को पार करते हुए यह विश्व की नम्बर एक भाषा बनने की ओर अग्रसर है। प्रश्न है कि हमारा हिंदी के प्रति गौरव का भाव कितना जीवंत है, कहीं हम इसके प्रति हीनता के भाव से ग्रसित तो नहीं हैं, जो प्रायः देखा जाता है। दूसरा - हम अपने शोध के विषय के मूल तक पहुँचने के लिए संस्कृत को सीखने व इसकी गहराई तक उतरने के लिए कितने सचेष्ट हैं। तीसरा - अपने शोध को विश्वव्यापी विस्तार देने कि लिए हम अंग्रेजी सीखने के लिए कितने तत्पर हैं। चौथा – हम अपनी लोक भाषा, लोक संस्कृति को जीवंत बनाए रखने के लिए कितना जागरुक और सक्रिय हैं।

निष्कर्षतः, हमारे विचार से, जिस तरह से देवप्रयाग के पावन संगम पर भगरथी, अलकनंदा, मंदाकिनी और कितनी ही हिमनद की धाराओं का संगम गंगाजी का रुप ले आगे बढ़ता है और अपनी शीतलता, निर्मलता और पावनता के साथ देश की जीवन रेखा, संस्कृति की संवाहक बनकर जनमानस का कल्याण-त्राण करता है। कुछ ऐसे ही इस पावन संगम पर देवभाषा संस्कृत के साथ विभिन्न भाषाओं का जो समागम हो रहा है, इससे निस्सृत ज्ञान गंगा की पावन धारा देवभूमि का नाम सार्थक करेगी और ध्वंस, अशांति और समस्याओं से भरे आज के युग में शांति, सद्भाव, सृजन और समाधान का दिग-दिगन्त व्यापी संदेश प्रसारित करेगी। (राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, श्रीरधुनाथ कीर्ति परिसर, देवप्रयाग में राष्ट्रीय संगोष्ठी (30.01.2017) में प्रस्तुत विचार)

Wednesday, 18 January 2017

In the uplifting company of SWAMI VIVEKANANDA


Stick to your heartfelt CONVICTION, rest assured!
                  1.     Be aware of your Divine essence & Love yourself first

First of all love yourself. Be aware about the special capabilities, unique features and the inherent talent that you possess. As a human being you are embedded with divine potential touching Para-normal, Super-human and Spiritual realm. This is because of your Divine essence, Immortal roots and Spiritual destiny. So despite all human limitations, Cheer!! You are born to do great things, transcend all human limitations one by one and realize your true spiritual nature. Just ponder deep, doing your worldly duties focus on the imperishable amid the transient flow of life.


                    2.     Goal of Self Realization & the Power of Ideal
Your 1st goal of this transient life is – Self-realization. Knowing yourself is the beginning of all wisdom. All the peace, freedom, bliss and abiding success that you crave from the depth of your heart is within you. Searching them in the outer world at the cost of your inner treasure is the folly you have been ever committing far long. Don't fall in this trap anymore. Seek the holy company of the realized Soul and the true Master. Get in touch with the distilled wisdom of life, follow the inner dictate and tread the righteous path with all earnest, vigor and strength.
               3.     Self-responsibility: take the charge of your life
To march ahead, you have to take the whole responsibility on your own shoulders. No one is responsible for all the mess you are entangled in at this time. You have none to blame. Get out of this deception of endless blame game. With eternal faith on your Spiritual destiny take the charge of your life and march ahead. Faith, faith and faith on yourself i.e. the secret; then only faith on God. Be ready to even defy the false Gods that you have created and worshiping at the cost of your true Self. Remember-This World is the great Gymnasium, where we come to make ourselves strong. Thus Indulge in this adventure of Self-discovery, Self-realization and Self-renewal. There is no short cut. Self-discipline is the only way.
                  4.     Strength – Physical, mental, moral & spiritual
Remember-Strength, Strength and Strength!!! This is the remedy for all the diseases this world is suffering from. So be strong in every aspect. Be the Worshiper of Shakti. Remember the Mantra given by the wise forefathers (Rishis) - Balm upasya.  For this you have to stand on your toes, devote your best moments and dig deep with the muscles of iron & nerves of steel, gigantic will, which nothing can resist, which can penetrate into the mysteries of the Universe and will accomplish its purpose in any fashion, even if it meant going to the bottom of the ocean, meeting death face to face. This heroic spirit and the iron will are needed on the path, the road less traveled.

                5.     The power of mind – Concentration
Believe in the limitless power of your mind, boundless potential of your resolute will and persistent effort. The key to unlock your dormant potential lies in the power of concentration. For this, take up one thing at a time. Put your full energy on the task in hand to the exclusion of all else. Let your whole existence dance with its vibration for the time being. This is the way to succeed and make others blessed. For this you have to go deeper. Don’t touch those things even by feet that weaken you physically, mentally, morally and spiritually.
               6.     Character building – the unshakable foundation
Also know the power of Character. It is the Character that leaves its indelible mark on the blank canvas of time, even if only a few words are uttered. It speaks louder than all the pomp and show, all the jugglery of words and scholarly intellectual gymnastic. The basis of character building is the purity of intention, goodwill and self-sacrificing spirit. It gains strength with mind dwelling in higher thoughts and living constantly with the highest Ideal day and night. It is not a momentary affair; Character has to be established through a thousand stumbles. It is a lifelong process, slow and at times painful. But its fruits are worth all the pain and sacrifices on the way. Its rewards are the sweetest ones in the end. Once formed, it is the Character that can cleave through the adamant walls of difficulties and triumph amidst all the worldly odds and oppositions.
                 7.     Ideal of Selfless Service – Shiv bhave jeev seva
Serving the needy, helping the weak and deprived, becoming the voice of the voiceless is the natural outcome of this process. Helping others without any expectations, without any hope is the natural flow of a sensible heart. Remember-each act of noble thinking and selfless service breaks one chain of bondage and purifies the Chitta. Thus serving man as GodShiv bhave Jeev seva becomes the guiding motto on the way. This is the ultimate secret to come out of the limiting spell of ego and little self. For this one has to grow from inside out. None can make you spiritual. Master only points at the Ultimate, you have to strive hard and ascend the peaks of your own.
                 8.     Be Fearless, face the terrible boldly
The path is not that easy as worked out on the papers and mind. The path of Self-renewal, Self-realization is the roughest and the toughest on the ground. No wonder so many fails on the way, so many compromising under the bewitching spell of transient pleasures and worldly pressures. No wonder a few crosses the shore and sip the nectar of eternal bliss. 
So be the humble worshiper of Truth, the warrior of Light with the fire of Spiritual conviction. Let the terrible, the darkness come on the way, this is the nature of the path.  Stand up & fight! Not one step back, that is the idea, fight it out, whatever come. Face the terrible, face it boldly. Live the Truth even if your legs shake. With each resolute step and persistent effort, your Spirit will grow stronger; your voice will gain strength and one day become omnipotent and invincible.
                 9.     Arise, awake & stop not till the goal is reached
Thus cheer O vibrant Soul, the aspirant of the Highest, the seeker of the Truth, striving Excellence and Perfection in this very life; seeking this world to be a better place to live with. The vanity, the follies of this life are many, but be a person of clear vision. Seek the company of the wise, the illumined, the noble. The magnet of your aspiration and sincerity will one day definitely attract the Master’s grace and get its transforming touch. This is the royal path of Being and Making. Ideal of serving the Nation, society and humanity etc. are the subsequent results of this Self-transformation. You just stick to your heart felt conviction and rest assured. The world will get better in the degrees you get transformed.
Remember, you are not born to die as a worldly worm; you are born to do great things. Leaving this life without realizing your spiritual destiny and true potential would be a tragic misfortune. So, Arise and awake to the lofty Ideal, echoing in the sky since eternity & keep moving until the goal is reached.