Sunday, 10 December 2017

भारतीय प्रेस दिवस (16 नबम्वर) पर मीडिया मंथन-भाग2



भारतीय पत्रकारिता – दशा, दिशा एवं दायित्वबोध
माना चारों ओर घुप्प अंधेरा, लेकिन दिया जलाना कब है मना

पिछली पोस्ट के आगे जारी......
ऐसे में आजादी के संघर्ष के दौर की पत्रकारिता पर एक नजर उठाना जरुरी हो जाता है।
स्वतंत्रता संग्राम की पत्रकारिताएक मिशन
आजादी के दौर में पत्रकारिता एक मिशन थी, जिसका अपना मकसद था – जनचेतना का जागरण, देश को गुलामी से आजाद करना और अपने सांस्कृतिक गौरवभाव से परिचय। भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर महावीरप्रसाद द्विवेदी, श्रीअरविंद से लेकर गणेशशंकर विद्यार्थी और माखनलाल चतुर्वेदी से लेकर विष्णु पराड़कर तक आदर्श पत्रकारों की पूरी फौज इसमें सक्रिय थी। वास्तव में देश को आजाद करने में राजनीति से अधिक पत्रकारिता की भूमिका थी। स्वयं राजनेता भी पत्रकार की भूमिका में सक्रिय थे। तिलक से लेकर लाला लाजपतराय, सुभाषचंद्र बोस से लेकर गांधीजी व डॉ. राजेंद्रप्रसाद जैसे राजनेता इसका हिस्सा थे।

आजादी के बाद क्रमशः इस मिशन के भाव का क्षय होता है। शुरुआती दोतीन दशकों तक नेहरुयुग के समाजवादी विकास मॉडल के नाम पर विकास पत्रकारिता चलती रही। लेकिन आपात के बाद प्रिंटिंग प्रेस में नई तकनीक के आगमन व उदारीकरण के साथ इसमें व्यावसायीकरण का दौर शुरु हो जाता है। मीडिया एक उद्योग का रुप अखित्यार कर लेता है, और पत्रकारिता के मानक क्रमशः ढीले पड़ने लगते हैं। पत्रकारिता से मिशन के भाव का लोप हो जाता है और पत्रकारिता के आदर्श धूमिल होते जाते हैं।

इसकी एक झलक 2001 में प्रकाशित प्रेस परिषद की रिपोर्ट से स्पष्ट हो जाती है, जिसमें तत्कालीन भारतीय पत्रकारिता के व्यापक सर्वेक्षण के आधार पर उभरती चिंतनीय प्रवृतियों को रेखांकित किया गया था, जो निम्न प्रकार से थीं -
1.     विशेष वर्ग का ध्यान, आम जनता से क्या काम
2.     जनसराकारों की उपेक्षा या दमन
3.     आर्थिक पत्रकारों को अनावश्यक महत्व
4.     गल्त एवं भ्रामक सूचना
5.     राजनेताओँ एवं व्यावसायिओं का साया
6.     अपर्याप्त विकासपरक पत्रकारिता
7.     जनता की अपेक्षा बाजार को प्रधानता
8.     नारी शक्ति का अवाँछनीय चित्रण
9.     गप्प-शप को अनावश्यक महत्व
10.                        सनसनी खबरों को प्रधानता
11.                        व्यैक्तिक जीवन में ताक-झाँक
12.                        पपराजी का बढता सरदर्द
13.                        सूचना संग्रह के वेईमान तरीके
14.                        अवाँछनीय सामग्री का बढ़ता प्रकाशन
15.                        दुर्घटना एवं दुखद घटनाओँ के प्रति अमानवीय रवैया
16.                        विज्ञापन और संपादकीय में घटता विभेद
17.                        पत्रकार की निर्धारित योग्यता के मानदण्ड का अभाव
18.                        ओपीनियन पोल की खोल
19.                        प्रकाशन या सूचना के दमन में रिश्वत का बढता चलन
20.                        मुद्दों का उथला एवं अप्रमाणिक प्रस्तुतीकरण
21.                        विज्ञापन की बढती जगह
22.                        पश्चमी संस्कृति एवं मूल्यों का अँधानुकरण
23.                        प्रलोभन के आगे घुटने टेकता पत्रकार
24.                        साम्प्रदायिकता का बढ़ता जहर
25.                        अपराध और सामाजिक बुराइयों का गौरवीकरण
26.                        अपराधी पर समयपूर्व निर्णय की अधीरता (मीडिया ट्रायल)
27.                        प्रतिपक्ष के तर्कों व दलीलों की उपेक्षा
28.                        संपादक के नाम पत्र में गंभीरता का अभाव
29.                        अनावश्यक प्रचार से वचाव
30.                        विज्ञापन के साय में आजादी खोती पत्रकारिता
31.                        संपादकीय गरिमा का ह्रास
भारतीय पत्रकारिता की उपरोक्त नकारात्मक प्रवृतियां आज लगभग 17 वर्षों के बाद और गंभीर रुप ले चुकी हैं। जिसमें पेड न्यूज जैसे घुन के साथ पत्रकारिता एक विकाऊ पेशा तक बन चुकी है। कॉर्पोरेट घरानों, राजनैतिक पार्टियों, देशद्रोही शक्तियों के हस्तक्षेप खुलकर काम कर रहे हैं। टेक्नोलॉजी के विकास के साथ आपसी प्रतिस्पर्धा भी अपने चरम पर है, लाभ कमाने के लिए तमाम हठकंडे अपनाए जा रहे हैं। पत्रकारिता का गिरता स्तर ऐसे में चिंता का विषय है।

कन्वर्जेंस के वर्तमान दौर में टीवी पत्रकारिता अपनी विश्वसनीयता के संकट के सबसे गंभीर दौर से गुजर रही है। सुबह ग्रह-नक्षत्र-भाग्यफल, दोपहर को फिल्मी दुनियाँ की चटपटी गपशप और शाम के प्राईम टाईम की ब्रेकिंग न्यूज और निष्कर्षहीन कानफोड़ू बहसवाजी, रात को भूतप्रेत, नाग नागिन, बिगबोस का हंगामा – यह टीवी की दुनियाँ की एक मोटी सी तस्वीर है, जिसके चलते टीवी माध्यम के प्रति गंभीर दर्शकों का मोहभंग हो चला है। आश्चर्य यह है कि इस सबके बीच भी इनकी टीआरपी बर्करार है, यह विचारणीय है। कुछ ही चैनल अपनी गंभीरता और विश्वसनीयता को बनाए हुए हैं, व्यापक स्तर पर स्थिति चिंताजनक है। कंटेंट आधारित पत्रकारिता के संदर्भ में टीवी माध्यम अकाल के दौर से गुजर रहा है कहें तो अतिश्योक्ति न होगी।

वेब मीडिया अपने लोकताँत्रिक स्वरुप, इंटरएक्टिवनेस के कारण लोकप्रिय हो चुका है। लेकिन बच्चों से बुढ़े, किशोर से युवा एवं प्रौढ़ इसकी लत के शिकार होते जा रहे हैं। इससे एडिक्ट मनोरोगियों की संख्या बढ़ रही है। इसके साथ इंफोर्मेशन बम्बार्डमेंट के युग में ईंफोर्मेशन ऑवरलोड़ की समस्या बनी हुई है और फर्जी सूचना (फेक न्यूज) का संकट एक नई चुनौती बनकर सामने खड़ा है। इस वर्ष फेक न्यूज सबसे प्रचलित शब्द रहा है। आम उपभोक्ता के लिए इससे आ रही सूचनाओं का रचनात्मक उपयोग कठिन ही नहीं दुष्कर हो चला है।
उपरोक्त वर्णित सीमाओं के बावजूद तुलनात्मक रुप में प्रिंट मीडिया की साख बनी हुई है, लेकिन धीरे-धीरे यह माध्यम इंटरनेट में समा रहा है। हालांकि भारत में अगले 2-3 दशकों तक इसका अस्तित्व बना रहेगा, ऐसा विशेषज्ञों का मानना है। और सभी माध्यमों (रेडिया, टीवी, फिल्म, अखबार, मैगजीन) के इंटरनेट में समाने से वेब मीडिया भविष्य का माध्यम बनना तय है।

नैतिक उत्थान, राष्ट्र निर्माण एवं आधुनिक पत्रकारिता
अपनी व्यावसायिक मजबूरियों के साथ मुख्यधारा की पत्रकारिता की सीमाएं समझी जा सकती हैं। हालांकि इसके बीच भी संभावनाएं शेष हैं। मीडिया में चल रहे सकारात्मक प्रयोग आशा की किरण की भांति आशान्वित करते हैं। पॉजिटिव स्टोरीज हालांकि अंदर के पन्नों में किसी कौने तक सिमटी मिलती हैं, लेकिन इनकी संख्या बढ़ रही है। दैनिक भास्कर हर सोमवार फ्रंट पेज में सिर्फ पाजिटिव न्यूज को दे रहा है, जो अनुकरणीय है।
यहाँ ज्ञातव्य हो कि इस्रायल
और जापान जैसे देशों में शुरु के पन्नों में सिर्फ पॉजिटीव न्यूज ही छपती हैं। राजनैतिक, अपराध या अन्य नकारात्मक समाचार इसके बाद के पन्नों में ही स्थान पाते हैं। क्या यह भारतीय मीडिया में संभव नहीं है, विचारणीय है।
किसानों को लेकर दूरदर्शन के किसान चैनल जैसी पहल अपनी तमाम कमियों के बावजूद सराहनीय है। प्राइवेट चैनल दिन भर के ब्रेकिंग न्यूज के बीच कुछ देर किसानों सहित गरीब, आम जनता व पिछड़े तबके की सुध-बुध ले सकते हैं। प्रेरक सक्सेस स्टोरीज से दर्शकों का ज्ञानबर्धन एवं स्वस्थ मनोरंजन कर सकते हैं।
वेब मीडिया उपरोक्त वर्णित तमाम खामियों के बीच भी अल्लादीन के चिराग की तरह है, जिसमें खोजने पर तमाम तरह के सकारात्मक प्रयोग खोजे जा सकते हैं।

एक बात और गौरतलब है कि हर माध्यम में आध्यात्मिक कंटेट की मात्रा बढ़ती जा रही है, जिसके साथ मीडिया में पॉजिटिव स्पेस बढ़ता जा रहा है। अखबारों में नित्य स्तम्भ छप रहे हैं, साप्ताहिक परिशिष्ट आ रहे हैं,  टीवी में आध्यात्मिक चैनलों की संख्या बढ़ी-चढ़ी है तथा इंटरनेट में ऐसी प्रेरक सामग्री की भरमार है। इनकी गुणवत्ता को लेकर सबाल उठ सकते हैं, लेकिन एक शुरुआत हो चुकी है, जो नैतिक विकास एवं राष्ट्र निर्माण के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
बनें समाधान का हिस्सा, निभाएं अपनी भूमिका
मीडिया से जुड़ी तमाम खामियों के बावजूद समाधान बहुत कुछ हमारे आपके हाथ में भी है। मीडिया कन्वर्जेंस की ओर बढ़ रहे जमाने में नियंत्रण हमारे हाथ में है। जो सीरियल या टीवी कार्यक्रम ठीक नहीं है, उन्हें न देखना हमारे हाथ में है, रिमोट से उन्हें बंद कर सकते हैं। मिलजुल कर यदि हम यदि यह करते हैं, तो उसकी टीआरपी गिरते ही इनका गंदा एवं कुत्सित खेल खुद व खुद खत्म हो जाएगा। यदि ऐसा नहीं हो रहा है तो फिर हम ऐसे कार्यक्रमों को झेलने की नियति से नहीं बच सकते।
फिर, मोबाईल हमारे हाथ में है, हम क्या मेसेज भेजते हैं, क्या देखते हैं, क्या फोर्वाड करते हैं, कितनी देर मोबाईल से चिपके रहते हैं, कितना इससे दूर रहते हैं। सबकुछ हमारे हाथ में है। सोशल मीडिया के युग में हम सब इसके उपभोक्ता के साथ एक संचारक की भूमिका में भी हैं, ऐसे में हमारी जिम्मेदारी बडी हो जाती है। अब ये दारोमदार हम आप पर है कि हम सोशल मीडिया का मालिक की तरह प्रयोग करते हैं या इसके गुलाम बन कर रहते हैं।

एक जिम्मेदार मीडिया संचारक की भूमिका में हम एक नागरिक पत्रकार की भूमिका में अपना योगदान दे सकते हैं। यदि हमें कोई समाधान सूझता हो तो उसे किसी फोटो, मैसेज, कविता, ब्लोग पोस्ट या वीडियो आदि के माध्यम से उपयुक्त प्लेटफॉर्म पर शेयर कर सकते हैं। सारा दारोमदार जाग्रत नागरिकों एवं प्रबुद्ध मीडिया उपभोक्ताओं पर है। मात्र मीडिया पर दोषारोपण करने से समाधान निकलने वाला नहीं। अंत में यही कहना चाहेंगे कि,
माना चारों ओऱ घुप्प अंधेरा, लेकिन दिया जलाना कब है मना

यदि कमरे में सदियों से अंधेरा है, तो अंधेरे को कोसने से कुछ होने वाला नहीं, जो अंधेरे में लाठी भांजने जैसे होगा, देर है तो बस एक दीया भर जलाने की।
(डीएवी यूनिवर्सिटी, जालन्धर, राष्ट्रीय प्रेस डे, 16 नबम्वर, 2017 के अवसर पर, आधुनिक पत्रकारिता की नैतिक विकास एवं राष्ट्र निर्माण में भूमिका, विषय पर दिए गए उद्बोधन का सार अंश।)

Tuesday, 28 November 2017

भारतीय प्रेस दिवस (16 नबम्वर) पर मीडिया मंथन-भाग1



भारतीय पत्रकारिता – दशा, दिशा एवं दायित्वबोध

भारतीय प्रेस दिवस
भारतीय प्रेस परिषद (Press council of India) की स्थापना 16 नबम्वर, 1966 के दिन हुई थी, जिसका घोषित उद्देश्य था – 1. प्रेस की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखना अर्थात अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बर्करार रखना। तथा 2. भारत में प्रेस के स्तर को बनाये रखना व सुधारना अर्थात प्रेस की मनमानी को रोककर उस पर नैतिक अंकुश लगाना।
इस कार्य को करने के लिए प्रेस परिषद में एक अध्यक्ष (सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत जज) और एक सचिव के अतिरिक्त 28 सदस्य होते हैं, जिनमें से 20 प्रेस के प्रतिनिधि (मीडिया मालिक, श्रमजीवी पत्रकार एवं संपादक) होते हैं। तथा 5 सदस्य संसद (2 राज्य सभा और 3 लोक सभा) द्वारा नामित होते हैं और 3 शिक्षा, विधि व साहित्य ( क्रमशः विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, बार कांउसिल ऑफ इंडिया और साहित्य अकादमी) से जुड़े होते हैं।
प्रेस दिवस हर वर्ष 16 नबम्वर के दिन मनाया जाता है।

भारतीय मीडिया – एक विहंगम दृष्टि –

प्रिंट मीडिया – आज भारत की विविध भाषाओं में लगभग एक लाख से अधिक समाचार पत्र छप रहे हैं। हालाँकि आजकल हमारी सुबह मोबाईल पर व्हाट्सअप या इंस्टाग्राम के मैसेज के साथ होती है, लेकिन सुबह उठकर अखबार के पन्नों को पलटने की संतुष्टि अलग ही है। हिंदी, अंग्रेजी व क्षेत्रीय अखबारों की अपनी अपनी दुनियाँ है। सबकी अपनी खूबियाँ हैं, तो अपनी सीमाएं भी। जिन सूचनाओं को हम विस्तार से जानना चाहते हैं, उन्हें पत्रिकाओं में पढ़ते हैं। और आज तो लगभग हर विषय पर विभिन्न भाषाओं में पत्रिकाएं छप रही हैं। खेल से लेकर बिजनेस, पर्यटन से लेकर धर्म-अध्यात्म, विज्ञान से लेकर साहित्य, पर्यावरण से लेकर हेल्थ-फिटनेस हर विषयों पर पत्रिकाओं की भरमार है।

इलैक्ट्रॉनिक मीडिया – में आकाशवाणी से लेकर एफ-एम चैनल्ज और सामुदायिक रेडियो उपलब्ध हैं। आकाशवाणी के ही लगभग 420 स्टेशन हैं, जो देश की 99 फीसदी जनसंख्या तक पहुंच रखते हैं। टीवी में दूरदर्शन से लेकर प्राईवेट चैनलों की भरमार है। दूरदर्शन के लगभग 200 चैनल उपलब्ध हैं जबकि देश में लगभग 1800 प्राइवेट चैनलों का प्रसारण हो रहा है। बाकि तकनीकी प्रगति के साथ वेब मीडिया, ऑनलाईन या न्यू मीडिया अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहा है। इंटरनेट एवं सोशल मीडिया के साथ यह मोबाईल पर उपलब्ध है। ज्ञात हो कि मोबाईल धारकों की संख्या भारत में एक अरब का आंकड़ा छूने वाली है। हालांकि हर 10 में से 4 ही स्मार्टफोन धारक हैं, लेकिन इनकी संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। फेसबुक, व्हाट्सअप, ट्विटर, इंस्टाग्राम, टम्बलर, पिनटरेस्ट, यू-ट्यूब, लिंक्डेल जैसे सोशल मीडिया प्लेटफोर्म इनके दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुके हैं।

मीडिया असर विहंगम दृष्टि
प्रिंट मीडिया का जादू आज भी बर्करार है। आज भी लोग छपे पर विश्वास करते हैं। अपनी लम्बी सेल्फ लाइफ के कारण यह सबसे विश्वसनीय माध्यम है। कितने घोटालों का यहाँ पर्दाफाश हो चुका है। लेकिन इससे जुड़ा स्याह पक्ष है, इसमें विज्ञापनों का बढ़ता स्पेस और समाचारों की घटजी जगह। तय मानकों से अधिक विज्ञापन चलन बन चुके हैं। सबसे अधिक अखरता है जैकट पहने अखबार, जो पाठकों को सरदर्द से कम नहीं लगते। और कभी-कभी तो इनकी संख्या 3-4 तक हो जाती है। फ्रंट पेज पर हाल्फ जैकेट तो और भी इरिटेट करते हैं। इसमें भी एक नहीं कई बार तो दो-दो हाल्फ जैकेट देखने को मिल रहे हैं। फिर इसके साथ फ्रंट पेज पर नेगेटिव समाचारों की अधिकता सामान्य चलन बन चुका है।
इलैक्ट्रॉनिक मीडिया की विजुअल अपील प्रिंट से अधिक रहती है और यह अधिक प्रभावी भी है। साथ ही यह दिन भर की खबरों से अपडेट रखता है। लेकिन ब्रेकिंग न्यूज के नाम सनसनीखेज, नेगेटिव समाचारों की अधिकता इसके गंभीर प्रभाव को कम करती है। शाम व रात को पैनल डिसक्शन के नाम पर शौरगुल भरी निष्कर्षहीन चर्चाएं दर्शकों पर भारी पड़ती हैं।

वेब मीडिया के साथ पूरी दुनियाँ उपभोक्ताओं की मुट्ठी में है। इस माध्यम की विशेषता है इसका लोकतांत्रिक स्वरुप और इसकी इंटरएक्टिविटी। साथ ही यह  हर पल अपडेट रहता है, जिसके चलते टीवी चैनल अप्रासांगिक हो चले हैं। हाँ इसमें इंफोर्मेशन ऑवरलोड़ की समस्या एक चुनौती है, जिसके चलते सूचनाओं का घालमेल, फर्जी सूचनाओं की बहुतायत हो चली है। सही और गलत सूचनाओं व तथ्यों का चयन करना एक चुनौती बनता जा रहा है।
इस पृष्ठभूमि के साथ पत्रकारिता की नैतिक विकास एवं राष्ट्र निर्माण में क्या भूमिका हो सकती है, इसको जानने से पूर्व इसकी शक्ति-सामर्थ्य पर चर्चा करना उचित होगा।

पत्रकारिता एवं मीडिया की विशेषता एवं शक्ति-सामर्थ्य -
      लोकतंत्र का चतुर्थ स्तम्भ। वॉच डोग। सजग प्रहरि।
      सूचनाओं के आदान-प्रदान का माध्यम, नागरिकों को जागरुक करता है।
      लोकमत बनाने में मदद करता है, ऑपीनियन मेकिंग में सहायक।
      नयी जानकारी व ज्ञान के साथ पाठकों व दर्शकों को शिक्षित करता है।
      घोटालों का पर्दाफाश करता है। भ्रष्ट तन्त्र पर एक दबाव समूह की भांति काम।
   व्यक्ति के चिंतन को प्रभावित करता है, जो क्रमशः उसके व्यवहार एवं चरित्र को प्रभावित करता है। क्रमशः परिवार एवं समाज के निर्माण या विगाड़ का कारक।

मीडिया की इसी शक्ति को देखते हुए, कभी अकबर इलाहवादी ने कहा था कि खींचो न कमानों को तलबार निकालो, जब तोप मुकाबल हो तो अखबार निकालो। इसी तरह से अपने समय के महानतम यौद्धा नेपोलियन ने कहा था कि मैं सैंकड़ों-हजारों संगीनों की अपेक्षा तीन बिरोधी अखबारों को अधिक खतरनाक मानता हूँ।

ये अखबार के दौर की बातें हैं। आज के दौर में टीवी चैनल्ज व सोशल मीडिया के युग में मीडिया की शक्ति अनन्त गुणा बढ़ चुकी है, जिसके प्रभाव को लेकर शायद आज उनके शब्द कुछ ओर होते। पिछले कुछ वर्षों से विकिलीक्स व पनामा पेपर्ज के खुलासों से लेकर हाल ही में पेराडाईस पेपर्ज के खुलासों तक, किस तरह भ्रष्टाचार में लिप्त अपने-अपने क्षेत्रों की दिग्गज हस्तियाँ सूखे पत्तों की तरह काँपती पाई गई, कितने सत्ताधीश अर्श से फर्श पर आ गिरे, आधुनिक मीडिया की शक्ति-सामर्थ्य की बानगी पेश करते हैं।

मीडिया ग्लैमर  और युवा रुझान
आश्चर्य नहीं कि मीडिया की शक्ति के साथ इसका गलैमर व प्रभाव युवाओं को आकर्षित करता है। पत्रकारिता पाठ्यक्रमों से जुड़ने वाले अधिकाँश युवाओं को पूछने पर एक ही जबाव होता है कि वे टीवी एंकर या आरजे बनना चाहते हैं। इससे जुड़ी जिम्मेदारियाँ व भारी दायित्व से वे प्रायः अनभिज्ञ होते हैं। पत्रकारिता के मूल भाव से न्याय करने के लिए जिस सूझ, नैतिक बल, संयम, त्याग और व्याप्क एवं गहन अध्ययन की आवश्यकता होती है। जिस समय साध्य एवं कष्ट साध्य प्रक्रिया से गुजरकर इसका सही हकदार बनना होता है, इसके लिए आवश्यक धैर्य, श्रम व तप-त्याग के लिए प्रायः वे तैयार नहीं होते। सच यह है कि पत्रकारिता एवं मीडिया एक गुरुत्तर दायित्व से भरा पेशा है, जिसकी अपनी चमक है, अपना रोमाँच है और साथ ही वह अपनी कीमत माँगता है, जिसका कोई शोर्टकट नहीं।
इस कीमत को चुकाने की तैयारी किए बिना, जल्दी से शोर्टकट में इस पर छा जाने की मंशा रखने वाली भीड़ के चलते पत्रकारिता क्षेत्र आज दिशाहीनता एवं नैतिक अवमूल्यन के चिंताजनक दौर से गुजर रहा है।
दिशाभ्रम एवं नैतिक अवमूल्यन का दौर
जिस मीडिया को समाज का दर्पण मानकर, प्रहरि की भूमिका में इसका सही स्वरुप दिखाकर इसको दिशाबोध देने का दायित्व था, वह अपने उतल या अवतल स्वरुप के कारण विकृत तस्वीर पेश कर रहा है। पूरे सप्ताह भर का अखबार उठाकर देखें, सुबह से शाम-रात तक के टीवी चैनल्ज पर चल रही बहसों व ब्रेकिंग न्यूजों को देखें या फिर इंटरनेट-सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे संदेशों पर गौर फरमाएं, तो सारतत्व नेगेटिवीटी, सनसनाहट, जादू चमत्कार, शॉर्टकट, अंधविश्वास, ग्लैमर, चकाचौंध, फूहड़ता, अश्लीलता, हल्केपन से भरा मिलेगा।


देश-समाज व दुनियाँ में कुछ अच्छा भी हो रहा है, इस पर संदेह होने लगता है। जबकि बहुत कुछ अच्छा भी समाज व देश-दुनियाँ में हो रहा है। लेकिन इसका स्पेस मीडिया में किन्हीं कौनों तक सिमटा मिलता है। नकारात्मक तथ्यों की भरमार रहती है। कुल मिलाकर मीडिया की दशा व दिशा को देखकर कहें कि हम नैतिक अवमूल्यन के दौर से गुजर रहे हैं, तो गलत न होगा। सही-गलत के प्रति स्पष्ट समझ व सोच के अभाव में पत्रकारिता आस्था संकट के दौर से गुजर रही है।......जारी 


(डीएवी यूनिवर्सिटी, जालन्धर, राष्ट्रीय प्रेस डे, 16 नबम्वर, 2017 के अवसर पर, आधुनिक पत्रकारिता की नैतिक विकास एवं राष्ट्र निर्माण में भूमिका, विषय पर दिए गए उद्बोधन का सार अंश)