Tuesday, 29 March 2016

यात्रा वृतांत – अमृतसर सफर की कुछ यादें रुहानी, भाग-2



अंतिम दिन दो विकल्प थे– वाघा बोर्डर और डेरा व्यास। ट्रेन शाम को थी। अभी कुछ घंटे थे। विकल्प डेरा व्यास को चुना। इसके वारे में भी बहुत कुछ सुना रखा था। बस स्टैंड से सीधा बस व्यास के लिए मिल चुकी थी। 40 किमी यहां से। रास्ते में हरे भरे खेतों व कुछ गांव कस्वों को पार करती हुई बस हमें मुख्य मार्ग में छोड़ चुकी थी। यहाँ से कुछ दूरी पर व्यास रेल्बे स्टेशन तक पैदल पहुँचे। स्टेशन पर सेमल का वृहद वृक्ष इतिहास की गवाही दे रहा था। स्टेशन के पुल को पार करते ही हम उस पार बस स्टेंड पर थे। कुछ ही मिनट में बस आ चुकी थी। बस कुछ देर में खुलने बाली थी। इस दौरान स्टेशन की हरियाली, स्वच्छता और शांति को अनुभव करते रहे। इतना साफ स्टेशन पहली बार देख रहे थे। बस के गेट खुल चुके थे। हम पीछे कंडक्टर के पास ही बैठ गए। कंडक्टर डेरे का ही सेवादार था। सवारियों का भावपूर्ण बिठाते हुए, इनके मुख से कुछ सतसंग के स्वर भी फूट रहे थे। जिनमें दो बातें हमें महत्वपूर्ण लगीं, बिन गुरु जीवन का वेड़ा पार नहीं हो सकता और बिन बुलाए कोई यहाँ आ नहीं सकता।
बस भरते ही चल पड़ी। रास्ते में हरे भरे गैंहूं के खेत, बौर से लदे आम के बगीचे एक सुंदर दृश्यावली को सृजन कर रहा था। कुछ ही मिनट में हम डेरे के मुख्य द्वार को पार कर चुके थे। मार्ग के दायीं और पार्किंग की वृहद व्यवस्था चकित करने वाली थी, शायद हजारों बाहन एक साथ यहाँ खड़े हो सकते होंगे। इसके अंतिम छोर पर हम बस स्टैंड पहुंच चुके थे। हल्की बारिश हो रही थी। आश्रम में प्रवेश करने के लिए मोबाइल कैमरा आदि बाहर ही जमा करना अनिवार्य है। अतः इस तकनीकी बोझे को बाहर ही छोड़कर हल्का होकर अंदर प्रवेश किए। हालाँकि रास्ते के सुंदर दृश्यों को कैमरे में कैद करने और मोवाइल में झांकने की आदत कुछ देर जरुर परेशान की। पहली बार लगा कि बिना मोबाइल किस तरह से जिंदगी का अभिन्न अंग बन चुका है, जिसके बिना एक खालीपन सा कचोटने लगता है। 
अंदर पूछ ताछ कक्ष से आगे की जानकारी मिली। आश्रम का विस्तार कई 7 किमी की लम्बाई में है, सो पैदल तो इसे देखना सम्भव नहीं था। अंदर रिक्शा व कैव खड़े थे। दोपहर के दो बज चुके थे। स्थानीय परिजनों के सुझाव पर रिक्शा को चुना और लंगर की ओर चल पड़े। रास्ते में सफेद फूलों से लदे बागुकोशाव नाशपाती के बगीचे, आगे हवामहल और रास्ते के दोनों ओर की हरियाली प्रकृति की गोद में आने का सुखद अहसास दे रही थी। कुछ मिनटों के बाद रिक्शा रुक गया, उतर कर हम कुछ दूर पैदल चलते हुए लंगर स्थल पहुँचे। बहुत बड़ी छत के नीचे वृहद लंगर स्थल दिखा। पता चला यहाँ एक समय में 80,000 लोग भोजन कर सकते हैं। बाहर किनारे में प्लेट, गिलास आदि लेकर लंगर में बैठ गए। स्वादिष्ट पसादा लेकर पेट पूजा की। इसके बाद मौसम की ठंड़क को देखते हुए गिलास भरकर गर्म चाय ली। यहाँ बैठकर चाय की चुस्की के साथ भीड़ को देखकर कई विचार जेहन में कौंधते रहे। यहां युवा, महिलाएं, प्रौढ़, वृद्ध हर वर्ग के लोग दर्शनार्थी भीड़ का हिस्सा दिखे, लेकिन एक स्व अनुशासन दिख रहा था। लगा वातावरण का कितना असर हो सकता है। 
गिलास आदि धोकर वाहर निकले। रास्ते में एक युवक हमें मिला। हमें बैग टाँगे हुए उसकी जिज्ञासा थी कि हम कोई अजनवी बाहर से आए हैं। जल्दी ही हमारा परिचय हो गया। समयाभाव के कारण हमारे लिए सबकुछ देखना तो सम्भव न था, हमारा मुख्य मकसद यहाँ के साहित्य स्टाल तक पहुँचना था और इस आध्यात्मिक संस्था को जानने के भाव से कुछ मूल साहित्य खरीदना था। हमारी प्राथमिकता को देखते हुए वह उस ओर गाईड के रुप में साथ चलते रहे। रास्ते में डेरे के इतिहास व शिक्षाओं को सार संक्षेप से हमें परिचित कराते रहे।

यहाँ की साधना पद्वति में कर्मकाण्ड से मुक्त रखा गया है। सुमिरन, भजन प्रमुख आंतरिक साधन हैं और प्रेम व सेवा वाह्य साधन। यहाँ आश्रम की देखभाल सेवादार करते हैं, कोई नौकर नहीं है। छोटे बड़े काम का कोई भेद नहीं है। डेरा प्रमुखखुद को सबसे छोटा सेवादार मानते हैं। यहाँ परिसर के कूढ़े को गाढियों में लादते युवाओं को देखा, पता चला ये सेवाधारी हैं। आगे सड़क बन रही थी, यहाँ भी सेवादार सेवा दे रहे थे। आगे कैंटीन में भी सेवादारों को देखा। रास्ते में बज्री के पहाड़ों को देखा, जिनको सेवादार कूट कूट कर तैयार कर रहे थे। यहाँ की सारी सड़कें इंटे इन्हीं द्वारा तैयार की जाती हैं।

शीघ्र ही हम लाइब्रेरी में थे। एक बहुत बड़े हाल में यहाँ तमाम पत्र पत्रिकाएं रखी गयी हैं। एक सचित्र मोटी सी किताव हाथ लगी। 15-20 मिनट में इनके पेज पलटते हुए यहाँ के इतिहास से मोटा सा परिचय मिलता गया। समझ में आया कि इस युग में परिवार-गृहस्थी के बीच में आध्यात्मिक जीवन अधिक व्यवहारिक और प्रभावशाली हो सकता है। 

आश्रम व्यास नदी के किनारे है। हालाँकि अभी व्यास नदी यहां से काफी दूर जा चुकी हैं।कुल मिलाकर यहाँ संत परम्परा की एक अभिनव कढ़ी को सामूहिक मानव चेतना को उच्चतर आयाम तक पहुँचाने के प्रयोग को देखकर बहुत अच्छा लगा। आज के स्वार्थ, अहंकार से भरे मार काट बाले युग में खुद को गला ढलाकर कर गुरु, ईश्वर के पथ पर बढ़ाने के संत मार्ग को देखकर, सुखद अनुभूति हुई कि इंसानियत जिंदा है। मानवता का उज्जवल भविष्य ऐसे ही सम्मिलित प्रयासों का सत्परिणाम हो सकता है।


यहाँ से आटो में व्यास रेल्बे स्टेशन आए और ट्रेन से अमृतसर पहुँचे। जहाँ दून-अमृतसर एक्सप्रैस में बैठकर अपने गन्तव्य की ओर बापिस चल दिए। गोल्डन टेंपल और डेरा व्यास की स्वर्णिम और रुहानी यादों के साथ सुवह 8 बजे हरिद्वार पहुँचे। (समाप्त)

Sunday, 20 March 2016

यात्रा वृतांत – अमृतसर सफर की कुछ यादें रुहानी, भाग-1



यह हमारी दिन के उजाले में अमृतसर की पहली यात्रा थी। सामुदायिक रेडियो की कार्यशाला के उद्देश्य से अमृतसर जाने का संयोग बना था। कार्यशाला के व्यस्त शेड्यूल के बीच अधिक घूमने की गुंजाइश न थी। सो तीन दिवसीय कार्यशाला में फुर्सत के पलों में दूसरे दिन स्वर्ण मंदिर जाने का सुयोग बना और अंतिम दिन विदाई समारोह के बाद, ट्रेन की वापसी के बीच के समय में डेरा व्यास दोनों यात्राएं एक वेजोड़ रुहानी अनुभव के रुप में स्मृति पटल पर अंकित रहेंगी।
11 मार्च को ही सुबह हम दून-अमृतसर एक्सप्रेस से 800 बजे अमृतसर पहुंच चुके थे। रास्ते में ही सुबह हो चुकी थी। सो बर्थ से उतरते ही बाहर ट्रेन के दोनों ओर हरे भरे गैंहूं से लहलहाते खेत हमारा स्वागत कर रहे थे, जिनका हरियाली भरा नजारा आंखों को शीतलता और मन को ठंडक दे रहा था। रास्ते में फलों के बगीचे भी दिख रहे थे, संभवतः फूलों को देखकर नाशपाती, बागुकोषा के लग रहे थे और कहीं कहीं आम के। लेकिन बहुतायत में गैंहूं के खेत ही मिले। अमृतसर शहर के बाहर ट्रेन किसी पुल के नीचे काफी देर खड़ी रही। संभवतः हम शहर में प्रवेश कर चुके थे। यहाँ से पुल से आवागमन करती गाड़ियों, पुल के पास सफेदा के ऊँचे ऊँचे पेड़, सामने से गुजरती दूसरी लोक्ल ट्रेन और इनमें भाग दौड़ करती लोक्ल सवारियों की कवायद, सब तमाशे की तरह हम देख रहे थे। इसी बीच चाय की चुस्की के बीच इंतजार के इन पलों को यादगार बनाते रहे।
रास्ता खुलते ही थोड़ी देर में ट्रेन आगे बढ़ चुकी थी और कुछ ही मिनटों में हम अमृतसर स्टेशन पर थे। ओवरब्रिज को पार करते हुए हम स्टेशन के बाहर निकले। स्टेशन का प्रवेश द्वार अपने ऐतिहासिक वास्तुशिल्प के साथ अपनी विशिष्ट पहचान व परिचय दे रहा था। स्टेशन के पीछे पार्किंग के पार पीपल और वट के विशाल पेड़ यहाँ के पुरातन इतिहास की गवाही दे रहे थे। अपना गन्तवय अधिक दूर नहीं था। सो हमने रिक्शा में ही जाना उचित समझा, ताकि शहर का पूरा नजारा ले सकें। आसमान में बादल छाए हुए थे। काले काले बादल कभी भी बरसने की चेतावनी दे रहे थे। रात को शायद बारिश हो भी चुकी थी। जैसे ही हम आगे बढ़ते गए हल्की हल्की बारिश शुरु हो चुकी थी। हम इसको अपना स्वागत अभिसिंचन मानते हुए इसका आनन्द लेते रहे। रास्ते में सेमल के गगनचुम्बी वृक्षों पर लदे सुर्ख लाल फूल शहर में वसंत की वहार का परिचय दे रहे थे। आम के पेड़ों पर फूटे बौर भीनी-भीनी खुश्बू के साथ यात्रा का सुखद अहसास दे रह। झंडों से जड़े चौराहे को पार करते हुए हम आगे ऊँचे और भव्य भवनों के बीच बढ़ रहे थे। 
कुछ ही मिनटों में हम अपने गन्तव्य स्थल पर पहुँच चुके थे। अभी वर्कशॉप में आधा घंटा बाकि था, सो फ्रेश होकर हम सीधा कार्यशाला कक्ष पहुँचे। दिन भर कार्यशाला से सामुदायिक रेडियो की अवधारणा स्पष्ट हुई और समझ आया कि कैसे यह पब्लिक और प्राइवेट ब्रॉडकास्टिंग से भिन्न है। सफलतापूर्वक चल रहे सामुदायिक रेडियो के अनुभव बहुत प्रेरक और उत्साहबर्धक लगे। अगले दो दिनों में सामुदायिक रेडियो के विभिन्न पहलुओं से रुबरु होते रहे। सदस्यता पाने के लिए फार्म भरने की बारकियाँ समझ में आईं। बेसिल के प्रेजन्टेशन से आवश्यक तकनीकि जानकारियाँ मिली। सूचना और प्रसारण मंत्रालय से आए डॉ. मुनीश जी का भागीदारों से सीधा संवाद बहुत ह्दयस्पर्शी लगा। सबसे ऊपर कैंपस रेडियो के पितामह एस श्रीधरण जी से सीधा संवाद इस कार्यशाला की जान रहा। अंत में सीआरए टीम द्वारा सक्रीनिंग ड्रिल के साथ हम कार्यशाला से सीखे ज्ञान को एक सार्थक अनुभव के रुप में समझने का मौका मिला। जम्मु-काश्मीर, पंजाव, हरियाणा, उत्तराखण्ड और हिमाचल से लगभग 40 भागीदार आए थे। मीडिया हाइप के इस युग में सामाजिक परिवर्तन के एक सार्थक माध्यम के रुप में सामुदायिक रेडियो की उपयोगिता समझ में आ गयी।



स्वर्ण मंदिर – दूसरे दिन शाम को फुर्सत के पलों में स्वर्णमंदिर जाने का कार्यक्रम बना। बिना स्वर्ण मंदिर के अमृसर की यात्रा को अधूरा ही मान जाएगकब से यहाँ आने की योजना बन रह थी। पिछले ही साल दिसम्बर माह में लुधियाना में अपने 1986 बी.टेक. बैच की 25वीं साल गिरह पर अपने सहपाठी कंवलजीत आनन्द के साथ रात को 2 बजे ही यहाँ चल दिए थे और सुबह पाँच बजे से इसके दर्शन लाभ का सुअवसर मिला था। यह दर्शन एक अमिट सी छाप रुह पर छोड़ चुका था। स दिन एक झलक ही ले पाए थे। आज उसका अगला कदम बढ़ाने का सुयोग बन रहा था। हल्की बारिश के बीच रास्ते की तमाम बाधाओं को पार करते हुए हम गुरुद्वारा गेट पहुँचे। बहाँ से परिसर की भव्यता देखते ही बनती है। जुता स्टैंड पर जुता उतारकर हम अंदर प्रवेश किए। जुता स्टैंड पर सेवादारों का सेवाभाव दिल को छूने वाला रहता है। आगे जल बावड़ी को पार करते हुए मुख्य गेट पर पहुँचे। यहाँ प्रवेश करते ही सामने स्वर्ण मंदिर का विहंगम दृश्य एक आलौकिक अनुभव रहता है। आकाश में चाँद, सरोवर के जल में झिलमिलाती स्वर्णिम व रंगविरंगी आभा, एक दूसरे लोक में विचरण की अनुभूति देते हैं। 

ज्ञातव्य हो कि यहाँ के पवित्र सरोवर के नाम से शहर का नाम अमृतसर पड़ा है। मान्यता है कि यहाँ कभी घना जंगल था और इनके बीच में झील। यह शांत-एकांत स्थल साधु संतों की साधना स्थली, आश्रय स्थली थ बुद्ध भगवान ने भी यहाँ ध्यान तप किया था। श्री गुरु नानक देव जी ने इस स्थल में ास किया था। सिक्खों के चौथे गुरु राम दास ने इसकी नींव रखी और पांचवे गुरु अर्जुनदेव के समय में यह 1604 ईंस्वी में बनकर तैयार हुआ। सरोवर के मध्य रमंदिर साहिव में गुरुग्रंथ साहब की पूजा-अर्चना व पाठ प्रातः भौर से लेकर देर रात तक चलता रहता है, और इनकी पावन धुन से तीर्थ परिसर गुंजायमान रहता है।

दर्शनार्थ आयी भीड़ में एक अनुशासन, दर्शन का भाव, एक सकारात्मक लय, गुंज रहे शब्दकीर्तन की दिव्य ध्वनियाँ एक जीवंत जाग्रत तीर्थ का गाढ़ा अहसास देते हैं। इसके साथ ही सरोवर में निश्चिंत भाव से तैर रही मच्छलियाँ, संसार सागर में भटक रहे मनुष्य जीवन के गुढ़ रहस्य को प्रकट करती हैं, कि गुरु शरण में आया जीव संसार सागर में इन मच्छलियों सा निर्दन्द-निश्चिंत भाव से तैर सकता है, जीवन का सही आनन्द उठा सकता है। गुरुभाव से कटा जीव सामान्य मछलिों की भांति तमाम असुरक्षा भाव के बीच एक एक दुःखी-संतप्त जीव जीने के लिए अभिशप्त होता है।

सरोवर के किनारे परिक्रमा मार्ग पर दायीं ओर से आगे बढ़ते हुए मुख्य द्वार आता है, जहाँ से सीधे हरमंदिर साहब में प्रवेश होता है। दर्शनार्थियों के साथ हम आगे बढ़ते हुए धीरे धीरे मुख्य मंदिर की ओर बढ़ रहे थे। शब्द कीर्तन की धुन अंतःकरण में दिव्य भावों का संचार कर रही थी। संगत बीच बाले पथ पर पाठ करते हुए आगे बढ़ रही थी। मुख्य द्वार के पार अंदर गुरु ग्रंथ साहिव को माथा टेककर हम बाहर निकले। पीछे सरोवर के अमृत जल से अभिसिंचन करते हुए आगे बढ़े, प्रसाद लेकर परिक्रमा पथ पर आगे बढ़े। लगभग एक-ढेड़ घंटे खडे खड़े पैर थककर चूर हो चुके थे, सो कुछ पल किनारे में बिछी दरियों पर पाल्थी मारकर...ध्यान चिंतन में कुछ पल निमग्न रहे।

इसके बाद लंगर हाल में आए। यहाँ तीन मंजिलों में प्रसाद का वृहद आयोजन देखने लायक था। हजारों लोग एक साथ प्रसाद ग्रहण कर रहे थे। पता चला कि रोज लगभग एक लाख दर्शनार्थी इस लंगर में भोजन-प्रसाद ग्रहण करते हैं। यहाँ की अनुशासन, व्यवस्था देखने लायक थी कि किस तरह व्यवस्थित ढंग से सबको प्रेम पूर्वक प्रसाद का वितरण हो रहा था। सदा से ही गुरुद्वारे की लंगर व्वस्था के हम मुरीद रहे हैं। किसी भी गुरुद्वारे में यह पारमार्थिक व्यवस्था अनुकरणीय लगी है। भोजन-प्रसाद के बाद बाहर हम आए तो स्वयं सेवक जूझे बर्तनों को हाथ से लेते गए। गिलास, प्लेट व वर्तनों को साफ करने की स्वयंसेवक व्यवस्था लाजबाव दिखी। सैंकड़ों नहीं हजारों सेवादार यहाँ सफाई कर रहे थे। एक प्लेट कई चरणों में साफ होकर चकाचक साफ होकर बाहर निकल रही थी। अपनी सेवा में कोई छोटे बढ़े का भाव नहीं। सब अपनी पहचान, पद, जाति, धर्म, रुत्वा भूल कर गुरुकाज में एक भक्त की भांति मग्न – शायद यही तो आध्यात्मिक समाजवाद है, जिसके आधार पर युगऋषि सतयुग की कल्पना करते रहे हैं।
परिसर के परिक्रमा पथ पर बापिस आते हुए, हम स्वर्ण मंदिर को प्रमाण कर, बाहर जुता घर की ओर आएयहाँ से ऑटो से बापिस गन्तव्य की ओर कूच किए, चित्त पर स्वर्ण मंदिर की एक भाव भरी अमिट छाप लिए हुए, कि अगली वार थोड़ा अधिक समय लेकर इसके दर्शन करेंगे, यहाँ के भावसागर में ओर गहरी डुबकी लगाएंगे ।.........जारी।

Monday, 7 March 2016

जेएनयू प्रकरण – एक आम भारतीय शिक्षक के जेहन को कचोटते सवाल



जेएनयू के बारे में अधिक नहीं जानता था, न ही, वाम विचारधारा की गहराइयों को। लेकिन जब से 9 फरवरी को देश के प्रतिष्ठित शिक्षा केंद्र में देशद्रोही नारों का विस्फोट देखा, प्रकरण की नित नयी परतें सामने उधड़ती गईंं। यह विचारधारा युवा विद्यार्थियों की सोच में देश की बर्वादी का जहर भी घोल सकती है, समझ से परे था। गरीब-शोषितों की समता-एकता की आबाज के रुप में तो इसके स्वरुप को जानता था, लेकिन देश को खंडित करने वाली इसकी खतरनाक सोच से परिचित न था। घटना के बाद नित्य एक विद्यार्थी की भांति रोज घटनाक्रम पर नजर रखे हुए हूँ, देश-समाज व जीवन को संवेदित-आंदोलित करते इस घटनाक्रम के प्रकाश में किसी सार्थक समाधान तक ले जाते निष्कर्की खोज में
नित्य अपने पत्रकारिता विभाग में 12-14 हिंदी-अंग्रेजी के अखवारों पर एक नजर डालने का मौका मिलता है, हर दिन की घटनाओं से टीवी पर रुबरु होता हूँ, जो रह जाती हैं, वे सोशल मीडिया पर वायरल होते वीडियोज व शेयर से आ जाती हैं। सारा मंजर, सारा हंगामा, सारा खेल-तमाशा मूक दर्शक बन कर देखता रहा हूँ प्रकरण को पूरी तरह से समझने की कोशिश में कि ये देश में हो क्या रहा है। हम ये किस दौर से गुजर रहे हैं, देश व समाज किस दिशा में जा रहा है और विशेषक उच्च शिक्षा के केंद्र, जहाँ से हमेशा परिवर्तन की पटकथा लिखी जाती रही है। हर दिन बदलते घटनाक्रम के बीच प्रतिक्रिया देने से बचता रहा हूँ, लेकिन अब शायद कुछ कहने का समय आ गया है।
कुछ बातें जेहन को कचोट रही हैं, कुछ सवाल महासवाल बनकर खड़े हो गए हैं, कुछ निष्कर्ष बुद्धि से नहीं, ह्दय को आंदोलित कर फूट रहे हैं। उन्हें शिवरात्रि के पावन दिन मित्रों, सुधी पाठकों के सामने शेयर कर रहा हूँ। स्पष्ट कर दूं कि मैं राजनीति का पंडित नहीं, इसका सामान्य बोध रखता हूँ। न ही किसी वाद, प्रतिवाद का अंध समर्थक। भारत का एक आम नागरिक हूँ, एक शिक्षक हूँ, जिसमें एक सामान्य इंसान की तरह अपनी मातृभूमि के प्रति सहज-स्फुर्त अनुराग है। समाज में सकल जाति-पाति, धर्म-सम्प्रदाय, भाषा-लिंग, सीमाओं के भेदभाव के पार एकता-समता-शुचिता का पक्षधर हूँ, समर्थक हूँ। भारत की अनेकता में एकता की शक्ति को मानता हूँ। अपने देश की शाश्वत-सनातन ज्ञान-विज्ञान से समृद्ध अद्वितीय-अनुपम सांस्कृतिक-आध्यात्मिक विरासत व इसकी कालजयी सत्ता के प्रति आश्वस्त हूँ और इनके साथ भारत को विश्व के अग्रणी देशों की कतार में शामिल होता देखना चाहता हूँ। देश के साथ पूरे विश्व में अमन-चैन-शांति का हिमायती हूँ। संक्षेप में सत्यं, शिवं, सुन्दरं को जीवन का प्रेरक दर्शन मानता हूँ। अपनी जड़ों से जुड़ी वैज्ञानिक सोच वाले अध्यात्म, धर्म के साथ मानवता और अपनी सनातविरासत के साथ आधुनिकता  के संगम-समन्वय वाली संस्कृति में जीवन के समग्र समाधान की आश रखता हूँ।
जेएनयू प्रकरण ने, एक आम नागरिक की तरह हमें भी हिलाकर रख दिया है। देश की बर्वादी के नारों को सुनकर किसी भी नागरिक क खून में उबाल आना स्वाभाविक है। माना इस दौरान प्रसारित 5-7 वीडियो में 1-2 के साथ छेड़खानी हुई। इसके लिए वे मीडिया घराने कटघरे में हैं और इसके चलते आज टीवी माध्यम की विश्वसनीयता अपने निम्नतम स्तर पर है। इन्हें अपने गिरेवान में झांकने व गहन आत्म समीक्षा की जरुरत है। इनके आधार पर जो उन्माद का माहौल किसी एक व्यक्ति के प्रति खड़ा हुआ, जो ज्यादतियाँ कोर्ट में न्याय दूतों द्वारा हुई, वे भी घटना से जुड़ा एक काला अध्याय है। इस पर न्यायिक प्रक्रिया अपने ढंग से सक्रिय है। सरकार द्वारा पूरे प्रकरण क शुरुआती दौर की जल्दवाजी में हुई मिसहेंडलिंग भी उचित नहीं थी
पूरी प्रक्रिया में छात्र नेता कन्हैया की सशर्त रिहाई और उसका जेएनयू में संबोधन तक की घटना के बाद मीडिया, सत्ता पक्ष, प्रतिपक्ष, न्याय व्यवस्था और जेएनयू – सबकी भूमिका अग्नि परीक्षा से होकर गुजरी है। इन विप्लवी पलों से गुजरते हुए पूरा देश एक गहन मंथन की प्रक्रिया से गुजरा है और अभी मंथन जारी है। इसी घटना के समानान्तर सीमा पर और देश के अंदर हमारी रक्षा, सुख-चैन की खातिर कितने वीर सपूतों, जवानों को प्राणों की मौन आहूति देते देखा है।
जो बातें, राष्ट्रीय जीवन के इन विप्लवी क्षणों में स्पष्ट होती हैं, इन पर विचार करना लाजमी हो जाता है।
1.   टीवी माध्यम की निंदनीय फोर्जरी (छेडखान) के बावजूद यह तथ्य नजरंदाज नहीं होता कि देश विरोधी नारे नहीं लगे थे। जेएनयू के बाहर भी दूसरे विश्वविद्यालयों से इनकी गूँज उठी थी। शिक्षा के उच्चस्तरीय केंद्रों से जहाँ समाज निर्माण, राष्ट्र निर्माण की बातें होनी चाहिए थीं, वहाँ से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम, देश को तोड़ने की ये बातें कैसे उठ रही हैं, गंभीर चिंता का विषय है। जेएनयू की अकादमिक गतिविधियों के प्रति एक फौरी सी जानकारी थी, प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के गढ़ के रुप में, लेकिन इस घटना ने इस प्रगतिशील सोच पर गंभीर प्रश्न चिन्ह खड़र दि है। प्रश्न उठता है, कि युवाओं के जेहन में यह विष बीज कहां से वोए गए। इनको खाद-पानी देने वाला पोषण कहाँ से मिलता रहा। देश विद्रोही नारों को विश्व का कौन सा देश अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर बर्दाश्त कर सकता है। बुद्धिजीवियों को अपने भावशून्य कुतर्कों और अपन बौद्धिक उछलकूद (Intellectual gymnastic) से देश के आम जन को भरमाने की कुचेष्टाओं को रोज होते देखकर आश्चर्य होता है।
2.    इसी के साथ कन्हैया का जेल से छूटने के बाद के भाषण पर विचार आता है। अपने वक्तृत्व कौशल के आधार पर दर्शकों को अवश्य मुग्ध किया है। लेकिन यह एक जिम्मेदार छात्रनेता से अधिक एक राजनेता का भाषण था। इसके साथ कन्हैया ने अपना राजनैतिक भविष्य सुनिश्चित कर लिया है, लेकिन इनके साथियों द्वारा की गई देश विद्रोही कारगुजारियों का इन्हें कोई गिला शिक्वा नहीं है, बल्कि उनकी बेकसूर रिहाई की माँग उठती दिखी। इनकी गरीबी, समता आदि के जुम्ले राजनैतिक हथियार के रुप में उपयोग हो सकते हैं, लेकिन ये शांति सद्भावपूर्ण समग्र विकास और न्याय की अवधारणा को सुनिश्चित करेंगे, इस पर संदेह होता है। सामयिक तौर पर मीडिया ने इन्हें नायक जरुर बना दिया है, लेकिन इस देश की, इस जमीं की तासीर को समझे बिना यह नायकत्व कितना देर तक टिकता है, देखना बाकि है।
3.  राजनैतिक दलों को जिस मुद्धे पर एक जुट होना चाहिए था, वह इनकी वोट वैंक की कुत्सित राजनीति का शिकार हो गई। शायद यह देश का दुर्भाग्य है कि राष्ट्रीय एकता-अखण्डता के संवेदनशील मुद्दे पर, जहाँ पूरे विश्व में एक सुर से देश की आवाज बुलन्द होनी चाहिए थी, वहाँ तमाम विपक्षी राजनेता विघटनकारी तत्वों के पक्ष में समर्थन देते खड़े दिखे। ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर सत्ता पक्ष से भी अधिक संवेदनशील, धीर व संतुलित हेंडलिंग की उम्मीद थी, जिसे बीच बीच में बाधित होते देखा गया।
4.  आश्चर्य तब हुआ जब मीडिया का एक वर्ग भी इनके साथ सुर मिलाता दिखा। बड़े-बड़े पत्रकारों के चरित्र इसमें उजागर हुए हैं। एक दो पत्र को छोड़ अंग्रेजी प्रिंट मीडिया विघटनकारी तत्वों के पक्ष में खड़ा दिखा। ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर भी इनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रट्ट समझ से परे लगी। कुछ हिंदी पत्रों को भी इनकी देखादेखी में पासा पलटते देखा। पूरे प्रकरण की मीडिया कवरेज एक शोध-अध्ययन की विषय वस्तु है।
5.   कुछ टीवी चैनलों की भूमिका भी संदेह के घेरे में दिखी। कुछ चैनल जहाँ प्रकरण को संजीदगी से पेश करते रहे, कुछ एक को इनका महिमामंडन करते देखा गया। प्रकरण से जुड़े फुटेज से फोर्जरी अवश्य चिंता का विषय है। आश्चर्य नहीं कि इस सबके चलते इस समय टीवी माध्यम की विश्वसनीयता गहरे संकट से गुजर रही है।

पूरे प्रकरण में मोटी मोटी बातें, जो समझ में आ रही हैं -
a.     जो नारे लगे हैं, इन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम देना वेमानी होगा। नारों के पीछे की खतरनाक सोच की जड़ों तक जाना होगा। जिस विचारधारा में अपने देश-राष्ट्र-मातृभूमि-संस्कृति के प्रति अनुराग का भाव न हो, उससे सजग-सावधान रहने की जरुरत है। जो सृजन की बजाए ध्वंस में विश्वास रखती हो, जिसमें सत्यं, शिवं, सुंदरं का भाव बोध न हो, वह किसी भी तरह वरेण्यं नहीं हो सकती।
b.    शिक्षा के उच्चतर केंद्रों को कौरे बौद्धिक विलास, विकृत मानसिकता और भोगवादी संस्कृति का अड्डा बनने से रोकना होगा। अपनी जड़ों से जुड़कर, आम जनता की समस्याओं के समाधान केंद्र के रुप में, राष्ट्र निर्माण की प्रयोगशाला के रुप में इनको रुपांतरि करना होगा।
c.   विश्वविद्यालयों को ज्ञान साधना के उच्चस्तरीय केंद्रों के रुप में अपनी भूमिका निभानी होगी, जहाँ वैज्ञानिक, प्रगतिशील और मूल्यनिष्ठ समग्र सोच में शिक्षित-दीक्षित युवा पीढ़ी का निर्माण हो सके। समाज व देश को तोड़ने वाली राजनीति से इन्हें जितना दूर रखा जाए, शायद उतना वेहतर होगा।
d.    इस महत कार्य में शिक्षकों की भूमिका अहम है। अपने श्रेष्ठ आचरण, समग्र सोच व दूरदृष्टि के साथ युवा पीढ़ी में श्रेष्ठ संस्कारों का बीजारोपण उनका पावन कर्तव्य है। छात्रों में जीवन, समाज व विश्व के प्रति नीर-क्षीर विवेक और समग्र दृष्टि का विकास उनकी सफलता का मापदंड होगा
e.   तभी हम युवाओं की अजस्र ऊर्जा कसकारात्मक नियोजन कर समाज व राष्ट्र निर्माण क महत उद्देश्य को पूरा कर पाएंगे।   शायद तभी हम देश की रक्षा हित सीमाओं पर, सामाजिक जीवन के विभिन्न मोर्चों पर खून पसीना बहा रहे, गुमनामी में शहीद हो रहे हर जवान, किसान, श्रमिक, संत, सुधारक व हर आम इंसान के अनुदानों से पोषण पा रही अपनी शिक्षा के लिए मिली सुख-सुविधाओं, सुरक्षा व संरक्षण के साथ न्याय कर पाएंगे।
नहीं तो देश विद्रोही नारा लगाए बिना भी हम आत्मद्रोह, समाजद्रोह की श्रेणी में खुद को खडा पाएंगे, सरकार के कटघड़े में न सही, अपनी अंतरात्मा के कटघड़े में।