Wednesday, 29 July 2015

बस एक ही खासियत देखता हूँ इस अंधियारे में

हिम्मत नहीं हारा हूँ अभी
लिए अंतिम विजय की आश, खुद पर अटल विश्वास

एक ईमानदार कोशिश करता हूँ रोज खुद को गढ़ने की, 
लेकिन अभी, आदर्श से कितना दूर, अज्ञात से कितना मजबूर।

लोग कहते हैं कि सफल इंसान हूं अपनी धुन का, 
दे चुका हूँ कई सफल अभियानों को अंजाम,
 सफलता की बुलंदियों पर खुशियों के शिखर देखे हैं कितने,
लगा जब मुट्ठी में सारा जहाँ।

फिर सफर ढलुआ उतराई का, सफलता से दूर, गुमनामी की खाई,
सफलता का शिखर छूटता रहा पीछे, मिली संग जब असफलता की परछाई,
मुट्ठी से रेत सा फिसलता समय, हाथ में जैसे झोली खाली,
ठगा सा निशब्द देखता हूँ सफलता-असफलता की यह आँख-मिचौली।


ऐसे में, सरक रही, जीवन की गाड़ी पूर्ण विराम की ओर,
दिखता है, लौकिक जीवन का अवसान जिसका अंतिम छोर,
सुना यह एक पड़ाव शाश्वत जीवन का, बाद इसके महायात्रा का नया दौर,
क्षण-भंगुर जीवन का यह बोध, देता कुछ पल हाथ में शाश्वत जीवन की ढोर।

जीवन की इस ढलती शाम में, माना मंजिल, अभी आदर्श से दूर, बहुत दूर,
एक असफल इंसान महसूस करता हूँ खुद को, आदर्श के आयने में,
आदर्श से अभी कितना दूर, अज्ञात से कितना मजबूर।
बस एक ही खासियत पाता हूँ इस अंधियारे में, टिमटिमा रहा जो बनअंतर में आशादीप,

हिम्मत नहीं हारा हूँ अभी, लिए अंतिम विजय की आश, खुद पर अटल विश्वास।




Monday, 13 July 2015

फिल्म समीक्षा - बाहुबली, द बिगनिंग - विश्व सिनेमा की ओर भारतीय सिनेमा के बढ़ते कदम



फिल्म माध्यम की कालजयी सत्ता का अहसास कराता अभिनव प्रयोग


फिल्म बाहुवली ने व्यापत घोटालों के गमगीन माहौल के बीच रोमांच की एक ताजी ब्यार बहा दी है, जिसको लेकर चर्चा का बाजार गर्म है। महज दो दिन में 100 करोड़ का आंकडा पार करने बाली यह फिल्म भारत में एक-एक कर सारे रिकोर्ड तोड़ रही है और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर 9.5 आईएमडीबी रेटिंग के साथ भारतीय सिनेमा की सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही है। आश्चर्य नहीं कि क्रिटिक्स भी इसकी तारीफ करते दिख रहे हैं। 

जब मीडिया में इसकी चर्चा सुनी और इसका ट्रेलर देखा तो समझ में आ गया था कि थियेटर में जाकर ही देखना बेहतर होगा, लेप्टॉप या कम्पयूटर पर इसके साथ न्याय न हो सकेगा। फिल्म को लेकर अपने युवा मित्रों के साथ चाय पर चर्चा हो ही रही थी कि निर्णय हो गया कि शुभ कार्य में देर कैसी। बुकिंग हो गयी और दीवानों का टोला 10-15 किमी का सफर तय करता हुआ पेंटागन मल्टीप्लेक्स जा पहुंचा। हरिद्वार में रहते हुए यहांँ पर यह अपना पहला फिल्मी वाचन था। फिल्म देखकर लगा अपना निर्णय सही था और फिल्म अपनी चुनींदा चिर प्रेरक फिल्मों में शुमार हो गयी।
फिल्म रहस्य-रोमांच, एक्शन-थ्रिल, मानवीय संवेदनाओं-आदर्श एवं सर्वोपरि सशक्त प्रेरणा प्रवाह से भरी हुई है। उम्दा दृश्यों के बीच, नायक का कालजयी चरित्र इसे संभव बनाता है। फिल्म के पटकथा लेखक और डायरेक्टर एस.एस. राजमौली का क्रिएटिव जीनियस व उनकी पूरी टीम का अथक पुरुषार्थ इसके लिए साधुवाद का पात्र है। नायक जहाँ स्वाभाविक मानवीय दुर्बलताओं के बावजूद एक संवेदनशील एवं अजेय यौद्धा का चरित्र लिए हुए है, वहीं नारी पात्र अपने सशक्त चरित्र के साथ गहरी छाप छोड़ते हैं। फिल्म की शुरुआत ही नारीशक्ति की मरजीवड़ी राजनिष्ठा के साथ होती है, जिसमें नायिका खुद जलमग्न होकर भी शिशु (राजकुमार) की रक्षा करती है। इसी तरह धुर्त राजा की कैद में पड़ी रानी देवसेना अटल विश्वास को धारण किए अपने पुत्र का इंतजार कर रही है। राजमाता शिवगामी का चरित्र नीति, दृढ़ता, सूझ एवं साहस-शौर्य का पर्याय है। इस फिल्म यह केंद्रीय नारी चरित्र है। कमसिन नायिका अवंतिका भी अपने भव्यतम रुप में एक सशक्त किरदार लिए हुए है। नारी पात्रों का यह छवि चित्रण एवं सशक्त प्रस्तुतीकरण निश्चित रुप से इस फिल्म को नारी चरित्रों से खिलवाड़ करती आम भारतीय फिल्मों से अलग एक विशिष्ठ स्थान देता है।

फिल्म में उपयुक्त एनीमेशन तकनीक ने इसके दृश्यों को प्रभावशाली बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इस निमित सीजीआई और विजुअल इफेक्ट तकनीक का भरपूर प्रयोग हुआ है। दृश्य चाहे विराट झरने का हो, भव्य राजपरिसर का, वर्फीले पर्वतों से टुटते गलेशियर का या युद्धक्षेत्र का या अन्य, दर्शक सहज ही एक नयी दुनियां में विचरण की अनुभूति पाते हैं। दृश्य के साथ ध्वनि का इतना वेहतरीन एवं बारीकि के साथ संयोजन किया गया है कि दर्शक दृश्य का ही एक जीवंत किरदार बनकर फिल्म की कथा के साथ बह चलता है। पूरी फिल्म में लगता है हम किसी एक विशिष्ट कालखण्ड, भूखण्ड में एक स्वपनिल लोक में आ गए हैं जिसका जादू सर चढकर बोलता है, जैसा कि हम बचपन में इंद्रजाल या अमरचित्र कथा सरीखी कॉमिक्स पढ़कर अनुभव करते थे। फिल्म अपने विजुअल के माध्यम से ऐसा ही मोहक इंद्रजाल रचने में सफल हुई है। 
लड़ाई और युद्ध के दृश्यों से भरी होने के बावजूद फिल्म में इनके प्रति वितृष्णा का भाव नहीं पनपता। इन्हें बहुत ही कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है, हालांकि सभी दृश्यों को देखना कमजोर दिलों के लिए संभव न हो। युद्ध दृश्यों के चित्रण में भी लगता है फिल्म नये मानक स्थापित कर गयी है। इस संदर्भ में यह गलेडियेटर, ट्रॉय, 300 जैसी हॉलीवुड फिल्मों को भी पीछ छोड़ती नजर आ रही है। आई.एम.डी.बी. रेटिंग पर 9.5 अकों के साथ बाहुबली इस बक्त अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही है। इसके साथ भारतीय सिनेमा के विश्व सिनेमा की ओर बढ़ते कदमों को देखा जा सकता है।

फिल्म के पात्रों की चर्चा करें तो इसमें सभी अपनी जगह परफेक्ट प्रतीत होते हैं। नायकों को टक्कर देते खलयनायक भी अपनी कुटिलता, धुर्तता, छल, बल में पीछे नहीं हैं। फिल्म के पात्र कुछ कुछ महाभारत के पात्रों की याद दिलाते हैं। बिजाला देव की कुटिल चालें महाभारत के शकुनी मामा की याद दिलाती हैं, इनका शक्तिपुंज बेटा भल्लला देवा, दुर्योधन सा लगता है। राज्यभक्त कट्टप्पा, भीष्म पितामह की याद दिलाते हैं, जो एक सेवक की भांति राजधर्म को निभाने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध हैं और राजनिष्ठा एवं शौर्य की प्रतिमूर्ति हैं। जापान के समुराई यौद्धाओं की छवि सहज ही इनसे झरती दिखती है।  बाहुबली और शिवा में एक अचूक तीरंदाज के रुप में अर्जुन का अक्स झलकता है। वहीं भीम का बल, युधिष्ठिर की धर्मनीति एवं लोकसेवा का भाव भी इनमें मौजूद है। झरने को पार करते हुए कॉमिक चरित्र टार्जन की छवि भी सहज ही इनमें झलकती है। कुल मिलाकर नायक एक अंतःस्फुर्त एडवेंचर प्रेमी, साहसी, महाबली, संवेदनशील अपराजेय महायौद्धा का कालजयी चरित्र लिए हुए है, जिसके साथ दर्शक सहज ही रोमांचभरी विजयी यात्रा पर आगे बढ़ते हैं।

फिल्म की पटकथा इतनी कसी हुई है कि पूरी फिल्म दर्शकों का ध्यान बाँधे रखती है। पता ही नहीं चलता कि फिल्म कब खत्म हो गई। हालांकि फिल्म अभी अधूरी है, अगला भाग बाहुबली कन्कलूजन 2016 में रीलीज होगा, जिसका सभी को बेसव्री से इंतजार रहेगा।

कुल मिलाकर बाहुबली भारतीय सिनेमा में स्वस्थ एवं प्रेरक मनोरंजन की एक ताजी ब्यार की भांति है, जो अपने क्रांतिकारी प्रयोगों के साथ कई नए मानक स्थापित कर गई है। भारतीय फिल्मकारों को यहाँ तक पहुंचने के लिए गहन आत्म विश्लेषण करना होगा। इसमें भारतीय सिनेमा के विश्व सिनेमा की ओर बढ़ते कदमों को देखा जा सकता है। प्रकृति एवं रोमांचप्रेमी भावनाशील दर्शकों के लिए बाहुबली अंतर्क्रांति का शंखनाद है। इसके दृश्य दर्शकों के लिए विजुअल ट्रीट से कम नहीं हैं। यदि आपने फिल्म न देखी हो तो उमदा थियेटर में जाकर एक बार जरुर देखें क्योंकि ऐसी फिल्म युगों बाद ही बनती है।

यात्रा वृतांत - मेरी यादों का शिमला और पहला सफर वरसाती, भाग-2(अंतिम)




घाटी की इस गहराई में, इतने एकांत में भी युनिवर्सिटी हो सकती है, सोच से परे था। मुख्य सड़क से कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि शहर के बीहड़ कौने में प्रकृति की गोद में ऐसा प्रयोग चल रहा हो। लेकिन यही तो मानवीय कल्पना, इच्छा शक्ति और सृजन के चमत्कार हैं। लगा इंसान सही ढंग से कुछ ठान ले, तो वह कोई भी कल्पना साकार कर सकता है, मनमाफिक सृष्टि की रचना कर सकता है। यहाँ इसी सच का गहराई से अनुभव हो रहा था। कुछ ही मिनटों में हम कैंपस में थे। राह में विचारकों, शिक्षाविदों, महापुरुषों के प्रेरक वक्तव्य निश्चित ही एक विद्या मंदिर में प्रवेश का अहसास दिला रहे थे। प्रकृति की गोद में बसे परिसर में, नेचर नर्चरिंग द यंग माइंड्ज, की उक्ति चरितार्थ दिख रही थी। चारों और पहाडियों से घिरे इस परिसर में उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर सामने पहाड़ी पर तारा देवी शक्तिपीठ प्रत्यक्ष हैं। आसमां पूरी तरह से बादलों से ढ़का हुआ था, मौसम विभाग की सूचना के अनुसार भारी बारिश के आसार थे। सम्भवतः हमारा गुह्य मकसद पूरा होने वाला था।
गेस्ट हाउस में फ्रेश होकर, स्नान-ध्यान के बाद विभाग एवं विश्वविद्यालय के अकादमिक विशेषज्ञों के साथ निर्धारित मीटिंग सम्पन्न हुई। पूरे परिसर में दीवार पर हर कदम पर टंगे प्रेरक सदवाक्य मौन शिक्षण दे रहे थे। इनसे संवाद चलता रहा, जो अच्छे लगे, कैमरे में कैद करता रहा। आसमान में बादल तो सुबह से ही उमड़-घुमड़ रहे थे, लेकिन अब कुछ-कुछ बरसना शुरु हो चुके थे। लग रहा था, आज पूरा बरस कर ही रहेंगे और हमारी शिमला घूमने की योजना संभव न हो पाएगी। बाहर बादल क्रमशः घनीभूत हो रहे थे। पीठ में रक्सेक टांगे बाहर निकलते, इससे पहले ही बारिश शुरु हो चुकी थी। धीरे-धीरे बारिश जोर पकड़ती गई। कुछ ही मिनटों में मूसलाधार बारिश हो रही थी। पता चला कि इस सीजन की यह सबसे भयंकर बारिश थी। शुरु में तो हमें यह हमारी यात्रा में खलल डालता प्रकृति का हस्तक्षेप लगा। लेकिन थोड़ी ही देर में अनुभव हुआ कि शिमला के इसी रुप को निहारने की इच्छा लेकर तो हम आए थे, जो आज पूरी हो रही थी। लगभग एक घंटा तक विवि के स्वागत कक्ष में बारिश के नाद-ब्रह्म के बीच जीवन के नश्वर-शाश्वत खेल पर चिंतन-मनन करते रहे और वरसाती मौसम की शीतल फुआर का आनन्द उठाते रहे। इसको फोटो एवं बीडियो में भी यथासम्भव कैद करने का प्रयास करते रहे।



जब मौसम शांत हुआ तो गाड़ी से शिमला की ओर चल पड़े। रास्ते में सूखे नाले दनदना रहे थे। रास्ते में जगह-जगह झीलें बन गई थी। कहीं थोड़ा बहुत लेंडस्लाइड भी हो गया था। प्रकृति स्नान के बाद तरोताजा दिख रही थी। राह की शीतल व्यार सफर को सुखद बना रही थी। चीड़, देवदार के बनों के बीच हम पँथाघाटी पहुंचे। मुख्यमार्ग से आईएसबीटी की ओर बढ़ रहे थे। रास्ते में आश्चर्यचकित हुए की यहां बारिश की एक भी बूंद नहीं गिरी है। सारी बारिशा पंथा घाटी तक सीमित थी। प्रकृति के दैवीय संतुलन पर हमारी आस्था और प्रगाढ़ हुई, जिससे हम बरसात का आनन्द भी उठा सके और शिमला की बाकि यात्रा भी बादलों की फाहों के बीच कर सके। आइएसबीटी से होते हुए हम बालूगंज पहुंचे। यहां से एडवांस स्टडीज के चरणस्पर्श करते हुए समर हिल और फिर दाईं और से संस्थान की परिक्रमा करते हुए मुख्य गेट से संस्थान में प्रवेश किए। 


भारतीय उच्च अध्यय संस्थान, शिमला का एक प्रमुख आकर्षण है। इसके दर्शन के बिना शिमला की यात्रा अधूरी ही मानी जाएगी। 1888 में बना यह संस्थान भारत में शासन कर रही अंग्रेजी सरकार के वायसराय का निवास था। अर्थात यहीं से अंग्रेजी सरकार चलती थी। इसी लिए इसे वायसराय लॉज भी कहा जाता है। आजादी के बाद इसे राष्ट्रपति निवास के रुप में रुपांतरित किया गया। राष्ट्रपति महोदय से साल में एक-आध बार कुछ सप्ताहृ-माह के लिए यहां आते थे, बाकि समय यह मंत्रियों की आरामगाह बना रहता था। भारत के दूसरा राष्ट्रपति डॉ. एस. राधाकृष्ण की दूरदृष्टि का सत्परिणाम था कि इसे 1962 से उच्चस्तरीय शोध-अनुसंधान केंद्र के रुप में स्थापित किया गया। उद्देश्यों के अनुरुप इसकी पंच लाईन रही – ज्ञानमय तपः। इसी उद्देश्य के अनुरुप यहाँ देश-विदेश से फैलोज एवं एसोशिएट्स शोध-अध्ययन के लिए आते हैं। एक माह से लेकर दो वर्ष तक यहाँ रहकर शोधकार्य करते हैं। हर सप्ताह का एक सेमीनार इसकी विशेषता है। इसके अतिरिक्त सीजनल वर्कशॉप, सेमीनार, बौद्धिक आयोजन यहाँ चलते रहते हैं। मानविकी और सामाजिक विज्ञान में शोध-अनुसंधान के इच्छुक कोई भी पीएचडी धारी सत्पात्र यहाँ की ज्ञानसाधना का हिस्सा बन सकता है। इसका पुस्तकालय देश के वृहदतम और श्रेष्ठतम में से एक है। यही शोध का केंद्र होता है। यहाँ सुबह 9 बजे से लेकर शाम 7 बजे तक शोधार्थी ज्ञानसाधना में लग्न रहते हैं।


आज हम शाम को लेट हो चुके थे और संस्थान बंद हो चुका था। अतः वाहर से ही इसका विहंगावलोकन करते रहे, विताए पलों की यादें उमड-घुमड़ कर चिदाकाश पर बरसाती बादलों की तरह तैर रही थीं। इनकी शीतल फुआर से चित्त आनंदित-आल्हादित था। बादलों के साथ लुका-छिपी करते संस्थान के भव्य भवनों व देवतरुओं को केमरे में समेटते हुए कुछ मौसमी फोटो लिए। फिर यादों के समेटे बापिस लुगंज की ओर चल पड़े और अपनी फेवरट जलेवी-दूध की दुकान में पहुंचे। शिमला युनिवर्सिटी और एचवांस स्टडी का शायद की कोई छात्र एवं प्रोफेसर हों जो इस दुकान में न पधारे हों। यहाँ अपना मनपसंद नाश्ता किया। बाहर ढलती शाम का धुंधलका छा रहा था। साथ ही हल्की-हल्की बारिश भी शुरु हो चुकी थी। आज ही बापिस लौटना की बाध्यता थी, सो शिमला के बाकि हिस्से को अगली बरसात के लिए छोड़कर हम रात के बढ़ते अंधेरे को चीरती हुई रोशनी के बीच बस स्टेंड पहुंचे। यहाँ बस काउंटर पर खड़ी थी। टिकट लेकर प्रो. चौहान साहब से विदाई लेते हुए देहरादून के लिए बस में बैठ गए।
यहाँ से सोलन - चंडीगढ़ - नाहन - पांवटा साहिब होते हुए सुबह 5 बजे हम देहरादून पहुंच चुके थे। साढ़े छः बजे तक हम देसंविवि के गेट पर थे। बारिश की बूंदे अभिसिंचन करते हुए जैसा हमारा स्वागत कर रही थीं। बारिश से शुरु बारिश में खत्म शिमला का बरसाती सफर एक चिरस्मरणीय अनुभूति के रुप में अपने साथ था। यात्रा की खुमारी के साथ यात्रा की थकान को उतारते रहे। और नींद व थकान से हल्का होकर कलम उठाई, यात्रा के अनुभवों को कलमबद्ध करते रहे। यात्रा वृतांत आपके सामने है। 

शिमला घूमने के इच्छुक दोस्तों से इतना ही कहना है कि शिमला के हर मौसम के अपने रंग हैं। गर्मी में ठंड़क से राहत के लिए शिमला जाया जा सकता है, सर्दी में बर्फ का लुत्फ उठाया जा सकता है। पतझड़ और बसन्त के यहां अपने मनमोहक रंग हैं। लेकिन बरसात के मौसम के बिना शिमला का बास्तविक आनन्द अधूरा है। क्योंकि मौसम न अधिक गर्म होता है न अधिक ठंड़ा। उड़ते-तैरते आबारा बादलों के बीच घाटी का विहंगावलोकन एक स्वप्निल लोक में विचरण की अनुभूति देता है। हाँ बरसात में भारी बारिश से भीगने, भुस्खलन व बादल फटने जैसे खतरे तो अवश्य रहते हैं, लेकिन इन्हीं चुनौतियों के बीच तो यात्रा का रोमाँच अपने शवाब पर रहता है।