Sunday, 31 August 2014

शांतिदूत, सौंदर्य उपासक और हिमालय के चितेरे – महर्षि रोरिक






निकोलस रोरिक, रुस के सेंट पीटसबर्ग में पैदा, धरती माँ के ऐसे सपूत थे, जो सौंदर्य, कला और रुहानियत की खोज में निमग्न शांति के मूर्तिमान प्रतीक थे। रोरिक का जीवन किसी देश काल जाति धर्म या राष्ट्रीयता की सीमा में नहीं बंधा था, पूरा विश्व उनका घर था। वे एक विश्वमानव थे, विश्व नागरिक बनकर वे एक सौंदर्य उपासक, विचारक एवं सृजनधर्मी के रुप में जीवन के उच्चतम मूल्यों का प्रचार-प्रसार करते रहे। कला को उन्होंने इसका प्रमुख माध्यम चुना। उनकी विरासत आज भी प्रेरक है। प्रस्तुत है बहुमुखी प्रतिभा के धनी महर्षि रोरिक के व्यक्तित्व के प्रेरक आयाम –

एक चित्रकार के रुप में रोरिक – लगभग सात हजार चित्रों के रचनाकार रोरिक के प्रारम्भिक चित्र जहाँ पुरातात्विक खोज एवं इतिहास से प्रभावित रहे, वहीं परवर्ती काल में जीवन की उच्चतर प्रेरणा एवं जीवन दर्शन, प्रेरक रहा। रोरिक आलौकिक सौंदर्य से मंडित हिमालय के चित्रों के लिए विशेष रुप से जाने जाते हैं, जो कि उनके प्रकृति प्रेम और आध्यात्मिक सौंदर्य की खोज को अभिव्यक्त करते हैं। इन चित्रों में हिमालय की आत्मा बेजोड़ ढंग से प्रकाशित होती है। चित्रकार के साथ ही रोरिक एक कुशल मुरल पेंटर और डिजायनर भी थे।


पुरातत्वविद एवं वैज्ञानिक – बचपन से ही इतिहास और संस्कृति का अध्ययन उनका प्रिय विषय रहा और कालेज में भर्ती होने से पहले ही आर्कियोलॉजिकल सोसायटी के सदस्य बन चुके थे। शीध्र ही वे रूस के एक प्रख्यात पुरातत्वविद बन चुके थे। रूस के बाहर वे जहाँ भी गए पुरातात्विक अध्ययन करते रहे। उनके एशिया के कई खोजी अभियान विशुद्ध रुप से वैज्ञानिक उद्देश्यों को लेकर थे। अमेरिका की सरकार ने गोबी रेगिस्तान में सूखारोधी वनस्पति की खोज के लिए रोरिक की सेवा ली थी। 1929 में हिमालय रिसर्च इंस्टीच्यूट की स्थापना हिमालय के पर्वतीय क्षेत्र की वनस्पति, भाषा, इतिहास एवं संस्कृति के वैज्ञानिक अध्ययन के उद्देश्य से की गई।

यायावर और खोजी – एक कलाकार-पुरातत्वविद के साथ रोरिक एक साहसिक यायावर और खोजी भी थे। अपने शोध एवं खोजी अभियान के लिए रोरिक ने रूस के बाहर यूरोप, अमेरिका और एशिया में कई यात्राएं की। इनमें मध्य एशिया की यात्रा सबसे रोमाँचक और खतरनाक थी। मध्य एशिया के बीहड़ पहाड़ों एवं दुर्गम क्षेत्रों से होते हुए यह यात्रा पाँच वर्ष चली। जिसमें मंगोलिया, तिब्बत और चीन होते हुए रोरिक भारत पहुँचे। राह में लुटेरों का सामना, खतरनाक घाटियोँ और मौसम की विषमता का सामना करते हुए बढ़ते गए और अपनी खोज, अनुभव एवं विचारों को चित्रों के माध्यम से संजोते रहे।


एक शिक्षाविद – 23 वर्ष की आयु से ही रोरिक शिक्षण कार्य करते रहे, जब सेंट पीटसबर्ग के इंपीरियल संस्थान में पुरातत्व के प्रोफेसर नियुक्त हुए। कुछ वर्षों बाद वे इसके निर्देशक बने। बाद के दिनों में अमेरिका में रोरिक ने मास्टर इंस्टीच्यूट ऑफ यूनाइटेड आर्टस की स्थापना की, जहाँ एक ही छत के नीचे सभी कलाएं सीखाई जाती थी। रोरिक म्यूजियम में सौंदर्य के माध्यम से शिक्षा दी जाती थी। रोरिक के शिक्षा सम्बन्धी बिचार बहुत ही प्रबुद्ध और प्रगतिशील थे। रोरिक अमेरीका, एशिया और यूरोप जहाँ भी गए, विविध विषयों पर व्याख्यान दिए, जो कला से लेकर पुरातत्व, मानवतावाद और दर्शन पर थे। श्रोता जहाँ रोरिक के आदर्शवादी और उत्कृष्ट विचारों से आकर्षित होते,  वहीं उनके एक प्रख्यात कलाकार और पुरातत्वविद् रुप से प्रभावित होते थे। शिक्षक के साथ रोरिक जीवनपर्यन्त एक जिज्ञासु विद्यार्थी ही बने रहे।

एक कवि और लेखक – रोरिक को एक ऐसा कवि माना जाता है जो चित्रों के माध्यम से खुद को व्यक्त करते थे, लेकिन वे अपनी गुह्य अनुभूतियों की अभिव्यक्ति कविता के माध्यम से भी करने में सक्षम थे। उनकी कविताओं का संकलन 1929 में फ्लेम इन चालिके नाम से प्रकाशित हुईँ। साथ ही रोरिक एक सिद्धहस्त लेखक भी थे। वे विभिन्न देशों की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लिखते रहे। उनके लेखों का पहला संकलन वर्ष 1914 में प्रकाशित किया गया और उनका कुल लेखन लगभग 30 खण्डों में संकलित है। उनका लेखन संस्कृति, दर्शन और मानवीय पहलुओं पर रहा। कुल्लू हिमालय की नग्गर वादियों में रोरिक अंतिम 20 वर्ष सृजन साधना में लीन रहे।

मानवतावादी एवं विश्व-शांतिदूत – इन सबके ऊपर रोरिक एक मानवतावादी थे। उनकी शैक्षणिक और कलात्मक गतिविधियाँ आम जीवन को बेहतरीन और कलात्मक बनाने के भाव से प्रेरित रहती थी। स्कूल हों या फैक्टरी, अस्पताल हों या जेल – रोरिक आम जनता से जुड़कर, संस्कृति के प्रति उत्साह जगाते रहे। युद्ध के सतत खतरों के बीच वे शांति और एकता के लिए काम करते रहे। प्रतिद्वन्दता और कलह से ध्यान बंटाने व इसे सृजन की ओऱ मोड़ने के लिए उन्होंने शांति का रोरिक पैक्ट शुरु किया और संस्कृति के विश्व संघ की स्थापना की। उनकी दृढ़ धारणा थी कि संस्कृति की रक्षा से ही शांति संभव है। रोरिक का शांतिध्वज (बैनर ऑफ पीस) काफी लोकप्रिय हुआ। वस्तुतः रोरिक की शाँति की कल्पना सौंदर्य पर आधारित थी। सौंदर्य ही जीवन के ऊबड़खाबड़पन को दूर करती है। सौंदर्य मन, वचन और कर्म हर स्तर से व्यक्त होता है।
रोरिक भारत को सौंदर्य़ की भूमि मानते थे। उनके शब्दों में – सौंदर्यमय भारत! तेरे नगरों, मंदिरों, खेतों और वनों में, पवित्र नदियों और तेरे हिमालय में जो महानता और संदेश छिपा है, उसके लिए तेरा हार्दिक नमन।


एक दर्शनिक – रोरिक एक व्यवहारिक आदर्शवादी थे। उनका जीवन ही उनके दर्शन की सटीक व्याख्या करता है। रोरिक का दर्शन कर्म, प्रेम और सौंदर्य से मंडित था, जो निरतंर सक्रियता में आस्था रखता था। उनका श्रम निस्वार्थ प्रेम और सौंदर्य़ की उपासना पर आधारित था, जिसे वे दिव्यता का सोपान मानते थे। इन अर्थों में रोरिक एक सच्चे कर्मयोगी भी थे।

एक गुह्यवादी, भविष्यद्रष्टा – रोरिक के चित्रों एवं लेखों से स्पष्ट होता है कि वे एक धार्मिक से अधिक आध्यात्मिक व्यक्ति थे। उन्होंने सभी धर्मों एवं दर्शनों के तत्वों को ग्रहण किया। उनके चित्रों में ईसा, बुद्ध, मुहम्मद, कृष्ण, लाओत्से, कन्फयूशिस से लेकर अन्य संत एवं महामानव आते हैं। उनकी रचनाएं एक गहन अंतर्दृष्टि और आध्यात्मिक भाव से मंडित रहीं। समकालीन विश्वप्रख्यात साहित्यकार गोर्की, रोरिक को अपने समय का सबसे महान इंट्यूटिव माईंड बताते थे। आश्चर्य नहीं कि, रोरिक एक भविष्यद्रष्टा भी थे। दोनों विश्वयुद्धों के पूर्व रोरिक को विश्व पर मंडराते काले बादलों का आभास हो गया था। इसी तरह आ रहे उज्जवल भविष्य का भी उन्हें आभास था, जो उनकी रचनाओं व लेखों में प्रकट होता रहा।


जीवन विद्या के आचार्य के रुप में – रोरिक का जीवन एक ऋषि जीवन था। जीवन जीने की कला के वे मर्मज्ञ थे। बंगाल स्कूल शैली के प्रवतकों में एक श्री अवनीद्रनाथ ठाकुर के शब्दों में – रोरिक सब कलाओं में सबसे कठिन जीवन जीने की कला को भी बखूवी जानते थे। अत्यंत मधुरभाषी और करुणाशील प्रो. रोरिक ने भयंकर कठिनाइयों के बीच भी अपना शोध अनुसंधान एवं गवेषणा जारी रखी और प्रभावशाली रचनाओं को अंजाम देते रहे।

इस तरह रोरिक एक भविष्यद्रष्टा, मानवता के अग्रदूत थे, जो एक बेहतरीन दुनियाँ के लिए एकाग्रचित्त होकर शांतिमय ढंग से काम करते रहे। मानव इतिहास के एक महानतम कलाविद के रुप में अमिट छाप छोड़ गए। उनके कलाकार पुत्र स्वतोसलाव रोरिक के शब्दों में – पिता एक महान दार्शनिक थे, सत्य के सतत अन्वेषी। शाश्वत ही उनका सतत प्रकाश स्तम्भ रहा। वे जो भी किए, वह सदा उनके अंतरभावों की अभिव्यक्ति रहा। उनके चित्रों की तरह उनका लेखन भी उनके सतत आंतरिक अन्वेषण और अनुभूतियों को व्यक्त करता रहा।


Saturday, 30 August 2014

खुद को इस खुमारी से उबारो



 इन शाश्वत सूत्रों पर तनिक विचार, जेहन में उतारो 




कहाँ खोए बेहोशी, मदहोशी में, सुख की खुमारी से बाहर निकलो,

नाव में जल सागर का भर चला, डगमग नैया को संभाल चलो,

नहीं कोई विरोधी बैरी प्रतिद्वन्दी यहाँ, जो किसी को हरा सके,

हैं अपने की छल छिद्र कुकर्म दुश्मन ऐसे, जो खुद को मात दें,

आमदनी चवन्नी खर्च रुपया, तिरस्कार और कष्ट तो तय भैया,

कर लो जितनी होशियारी-चालाकी, चोर-भ्रष्ट की रूह सदा कांपेगी।।

खोज है अगर सच्चे सुख-शांति की, तो अपने भीतर तनि निहारो,

सत्पुरुषों के अमृत वचनों पर, थोड़ा गौर फरमा, जेहन में उतारो।


क्यों कहा गया धर्मो रक्षति धर्मः, क्यों कहा गया सत्यमेव जयते,


क्यों कहा गया मातृवत परदारेषु, क्यों कहा गया परद्रव लोष्टवत्,

क्यों कही गयी बातें यम-नियम, प्रत्याहार, आत्मवत् सर्वभूतेषू की,

क्यों कहा गया काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहं को द्वार नरक का,

क्यों कहा गया संसार को दुम कुत्ते की, फूलों ढका सड़ा मुर्दा।

क्यों कहा गया संसार घर दुःख का, समाधान शरणागति प्रभु की,

क्यों विषाद प्रारम्भ योग का, दुःख दूत भक्त-वत्सल प्रभु का।।


ध्यानस्थ हो इन शाश्वत सूत्रों पर, अंतस्थ हो तनिक विचारो, 

कर्तव्य कर्म में हो प्रवृत, जड़ता के अभिशाप से खुद को पार तारो,

ज्ञान के निर्मल जल में लगा डुबकी, सुख की खुमारी से बाहर उबारो,

सद्गुरु से जोड़ तार दिल के, इस कुचक्र से खुद को बाहर तारो।।



Sunday, 24 August 2014

सावन में देवभूमि कुल्लू की स्वर्गोपम छटा

            यात्रा का आवाह्न देती कुल्लू की मनोरम वादियाँ


 (सावन के माह में यात्रा का यह संक्षिप्त वृतांत कुल्लु घाटी में प्रवेश से लेकर जाणा-नगर की यात्रा पर आधारित है, जिसका अनुभव इस मौसम में किसी भी पर्वतीय क्षेत्र पर न्यूनाधिक रुप में एक आस्थावान प्रकृति प्रेमी कर सकता है)


सावन माह के चरम पर जहाँ समूची धरती हरयाली की मखमली चादर ओढ लेती है, वहीं पर्वतीय क्षेत्रों में हरी-भरी वादियाँ, झरते झरने, फलों से लदे बागान और अपनी वृहद जलराशी से गर्जन-तर्जन करती हिमनदियाँ घाटी के सौंदर्य में चार-चाँद लगा देती हैं। ऐसे में अगस्त माह में इन घाटियों में यात्रा का आनन्द एवं रोमाँच शब्दों में वर्णन करना कठिन हो जाता है। इसे कोई घुम्मकड़ स्वामी ही इन वादियों के आगोश में खोकर अनुभव कर सकता है।


हालाँकि वर्षा के कारण यह समय खतरों से खाली नहीं रहता। बादल फटने से लेकर, हिमनदियों में बाढ़, भूस्खलन की घटनाएं आम होती हैं। लेकिन रोमाँचप्रेमी घुम्मकड़ों के मचलते पगों को अपनी तय मंजिल की ओर बढ़ने से ये खतरे भला कब रोक पाए हैं। अपने अंतर के अद्मय एडवेंचर प्रेम व अढिग आस्था के चलते सावन में भी कुछ जाबाँज घाटी के आवाहन को ठुकरा नहीं पाते।

एक आस्थावान यात्री के लिए इस माह की यात्रा किसी तीर्थ यात्रा से कम नहीं होती। हरीभरी वादियों के बीच सफर का आनन्द कोई रोमाँचप्रेमी ही बता सकता है। मौसन में न अधिक गर्मी होती है न ठण्ड। तापमान के सम-स्थिर बिंदु पर हवा का झोंका यात्रा के सफर को और सुहाना बना देता है। घाटियों में इधर से उधर तैरते आवारा बादलों की मस्ती देखते ही बनती है। पर्वतशिखरों को अपनी आगोश में लेते काले-सफेद बादल एक मनोरम दृश्य खड़ा करते हैं।

 
आस्थापूरित अंतःकरण के साथ पर्वतीय क्षेत्रों की यात्रा, एक आध्यात्मिक अनुभव से पूरित हो जाती है। प्रकृति के अलौकिक सौंदर्य के बीच चित्त सहज ही ध्यानस्थ हो जाता है। सहजानन्द की इस अवस्था में यात्री आत्मस्थ हो जाता है। जीवन का उच्चस्तरीय दर्शन चिदाकाश पर सूर्य की भाँति आलोकित हो उठता है। जीवन इन पलों में जैसे समाधि सुख ले रहा होता है। जीवन के सारे द्वन्द-विक्षोभ शांत हो जाते हैं। कल तक भौतिक एवं मानसिक संताप में झुलसता जीवन, आज स्वर्गीय सुख की अनुभूति से सराबोर हो जाता है।

कल तक जो पहाड़ी नाले सूखे पड़े थे वे आज दूधिया धार के साथ पग-पग पर झरते हुए, यात्रियों का स्वागत करते नजर आते हैं। इन झरनों व पहाड़ी नालों से पोषित हिम नदियाँ अपने पूरे यौवन में इठलाती हुई सागर की ओर बहती हैं व उनका उत्साह देखते ही बनता है। राह का शायद की कोई अवरोध, बाधा उनकी त्वरा, उनके उद्दाम वेग को रोकने की सोच सके, इनका सामना करने का दुस्साहस कर सके।


पहाड़ी के शिखर पर स्थित देवालय इस यात्रा को नए मायने दे जाते हैं। पिरामिड नुमा शिखर के दोनों ओर से बह रही हिम नदियाँ, ठीक शिखर के नीचे दिव्य संगम की सृष्टि करती हैं। कुल्लू में स्थित शिखर पर विराजमान बिजलेश्वर महादेव और उनके चरणों को पखारती व्यास एवं पार्वती नदियों का संगम कुछ ऐसा ही नजारा पेश करता है। ऐसे संगम स्थल लोक आस्था में एक तीर्थ का रुप लिए हुए होते हैं।

घाटी में फलों के बागान सफर के आनन्द को बहुगुणित कर देते हैं। राह से सटे फलों से लदे ये बगीचे दावत के लिए यात्रियों को खुला आमंत्रण दे रहे होते हैं। नाना प्रकार के फलों से लदे बागानों को देखकर लगता है कि जैसे प्रकृति ने दोनों हाथों से अपनी संपदा इन घाटियों पर लूटा दी हो। शायद ही ऐसा कोई घर हो जिसका अपना फल का वृक्ष न हो। खुमानी, प्लम, नाशपाती, चेरी, अखरोट, जापानी फल व सेब जैसे स्वादिष्ट फल इस क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। सेब के लिए तो यह क्षेत्र विशेषरुप से प्रख्यात है। 


गगनचुम्बी देवदार वृक्षों का उल्लेख किए बिना इस क्षेत्र का वर्णन अधूरा ही माना जाएगा। घाटी में प्रवेश करते ही दशहरा मैदान (ढालपुर) से ही देवदार आगंतुकों का स्वागत करते हैं। आगे जैसे-जैसे घाटी का आरोहण करते हैं, इनके सघन वन यात्रियों को दिव्यलोक में विचरण की अनुभूति देते हैं। ऊँचाई पर बांज, बुराँस के जंगल भी पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करते हैं। शिखर से घाटी का विहंगम दृश्य दर्शनीय रहता है। घाटी के बीच में बहती व्यास नदी पतली चाँदी की धार सी प्रतीत होती है।


ऋषियों की तपःस्थली होने के कारण इस भूमि को ऋषि भूमि के नाम से भी जाना जाता है। बशिष्ट, व्यास, मनु, भृगु, जमदग्नि जैसे ऋषियों की तपःस्थलियों से जुड़े इस क्षेत्र का इतिहास आज भी पुरातन युग की ओर ले जाता है। यहाँ हर गाँव का अपना देवता है, जिनकी आज्ञा-आदेश व मार्गदर्शन की छत्रछाया में ही यहाँ का लोकजीवन संचालित होता है। भगवान श्रीराम जिन्हें यहाँ ठाकुर कहा जाता है, इस क्षेत्र के प्रमुख आराध्य हैं, जिन्हें विश्व प्रख्यात दशहरा मेला के अवसर पर श्रद्धाँजलि देने सभी देवगण ढालपुर मैदान पधारते हैं। इसके साथ यह क्षेत्र शिव-शक्ति की विहार भूमि रही है। नाथ गुरुओं के यहाँ से कई स्थल जुडे हैं। सिक्खों के प्रथम गुरु नानक देव जी का भी यहाँ के मणिकर्ण क्षेत्र से जुड़ाव प्रख्यात है। कालांतर में यहाँ स्थापित गोंंपा (बौद्ध मंदिर) भी यात्रियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहते हैं।


कुल्लू मनाली के बीच में स्थित नग्गर (कुल्लु की प्राचीन राजधानी) की चर्चा किए बिना यात्रा अधूरी ही मानी जाएगी। नग्गर में रूस के विश्व विख्यात चित्रकार, पुरातत्वविद, यायावर, विचारक, भविष्यद्रष्टा एवं शांतिदूत निकोलस रोरिक की समाधि व शोध केंद्र स्थित है। सन् 1928 में रूस से यहाँ पधारे रोरिक ने जीवन के अंतिम 20 वर्ष गंभीर सृजन साधना में बिताए थे। इनको जानने वाले भावनाशीलो के लिए इनकी समाधि तीर्थ से कम नहीं है। नगर के इर्द-गिर्द कई दर्शनीय स्थल हैं, जिनमें जाणा फाल लोकप्रिय है। इसी की राह में देवदार के सघन वनों के बीच यात्रा व नीचे सुंदर घाटियों का अवलोकन बेजोड़ अनुभव साबित होता है।


अपने अप्रतिम प्राकृतिक सौंदर्य़ के साथ स्नो लाइन मनाली के समीप होने के कारण कुल्लू घाटी आज पर्यटन के एक प्रमुख हिल स्टेशन के रुप में लोकप्रिय है, जिसके कारण विदेशी मेहमानों का भी यहाँ आगमन बढ़ रहा है। कुछ काल का प्रवाह तो कुछ आधुनिकता का असर परम्पराओं पर साफ नजर आ रहा है। देववाद के साथ जुड़ी बलिप्रथा एवं शराब का बढ़ता चलन तथा युवाओं की अपनी संस्कृति के प्रति उपेक्षा चिंता का विषय है। लेकिन अपनी समृद्ध प्राकृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत के साथ यह क्षेत्र सांस्कृतिक-सामाजिक उत्थान का सबल आधार लिए हुए है। इसे किस तरह से परिमार्जित किया जाए, सुरक्षित रखा जाए व नई पीढ़ी तक हस्तांतरित किया जाए, यह विचारणीय है। इसी में इस देवभूमि के संतुलित एवं समग्र विकास का मर्म छिपा है।