Thursday, 31 July 2014

जब पहिया जीवन का ठहर सा जाए



जीवन में ऐसे क्षण आते हैं, जब जिंदगी का पहिया थम सा जाता है, जीवन ठहर सा जाता है। लगता है जीवन की दिशाएं धूमिल हो चलीं। प्रगति का चक्का जाम सा हो चला। विकास की राह अबरुद्ध सी हो चली। तमस के गहन अंधेरे ने वजूद को अपने आगोश में ले लिया।
इन पलों में बेचैनी-उद्विग्नता भरी निराशा-हताशा स्वाभाविक है। निराशा का दौर यदि लम्बा चले तो जीवन का अवसादग्रस्त होना तय है। जीवन के इन विकट पलों में जीवन अग्नि परीक्षाओं की एक अनगिन कड़ी बन जाता है। छोटी छोटी बातें गहरा असर डालती हैं, सांघातिक प्रहार लगती हैं। थोड़ा सा श्रम तन-मन को थका देता है। जीवन के उच्च आदर्श, लक्ष्य, ध्येय, क्राँतिकारी विचार-भाव सब न जाने किस अंधेरी माँद में जाकर छिप जाते हैं। जीवन एक निरर्थक सी ट्रेजिक कॉमेडी लगता है। भाग्य का विधान, भगवान का मजाक समझ नहीं आता। वह कैसा करुणासागर है, जिसका विधान इतना क्रूर, मन प्रश्न करता है। यथार्थ के पथरीले व कंटीले धरातल पर लहुलूहान जीवन ऐसा लगता है जैसे जेल में कैदी किसी जुर्म की सजा भुगत रहा हो।
इन पलों को धैर्य, संतुलन, संजीदगी से जीना ही वास्तविक कला है, असल बहादुरी व समझदारी है। जो इन क्षणों को साहसपूर्वक पार कर ले जाते हैं, वे समझ पाते हैं कि ये विकट पल प्रगति के लिए कितने जरुरी थे। नवल विकास के लिए परिवर्तन की यह प्रक्रिया कितनी आवश्यक थी, जैसे सुबह से पहले का घनघोर अंधेरा, रोशनी से पहले की लम्बी अंधेरी सुरंग, बरसात से पहले की अंगारे बरसाती गर्मी, बसंत से पहले की पतझड़ व हाड़ कंपाती ठंड।


येही वे क्षण होते हैं जब सबसे अधिक व्यक्ति के विश्वास की परीक्षा होती है। इन्हीं क्षणों में आत्म-श्रद्धा और ईश्वरीय न्याय पर आस्था काम आती है। धैर्य, ईमान, धर्म और भगवान इन्हीं क्षणों में काम आते हैं। अपने परायों की, मित्र-बैरी की, सच्चे झूठे की परीक्षा भी इन्हीं पलों में हो जाती है। अपनी अंतर्निहित क्षमताओं व शक्तियों से गाढ़ा परिचय भी इन्हीं पलों में होता है। यदि इन पलों को धैर्य, साहस व सूझ के साथ पार कर गए तो ये अनुभवों की ऐसी सोगात झोली में दे जाते हैं, जो जीवन को हर स्तर पर कृतार्थ कर देते हैं। अनुभव से मिला शिक्षण, बुद्धि को प्रकाशित करता है, भावनाओं को मजबूत करता है और व्यक्तित्व में एक नई शक्ति का संचार करता है। अपने चरम पर ये अनुभव आत्म जागरण के पल साबित होते हैं।
इन बोझिल पलों को सरल, सहज व संजीदा बनाने और इनसे उबरने में निम्न सुत्रों को अपनाया जा सकता है -
1.     इनको अपनी प्रगति का अनिवार्य अंग माने। धैर्यपूर्वक इनका सामना करें।
2.     अपने पुरुषार्थ को जारी रखें। सामाधान की दिशा में हर कदम मायने रखता है।
3.     ऐसे सत्पुरुषों का संग साथ करें, जो हौंसला देते हों।
4.     यदि ऐसा संग सहज न हो तो, इसकी पूर्ति महापुरुषों के प्रेरक सत्साहित्य से की जा सकती है।
5.     किसी से अपनी तुलना न करें। प्रपंच (परचर्चा-परनिंदा) से दूर ही रहें।
6.     अपने सपनों को मरने न दें। जो रुचिकर लगे, उस कार्य को करते रहें।
7.     प्रकृति का सान्निध्य ऐसे दौर में नई ऊर्जा व प्रेरणा का संचार करता है। यथासंभव इसका लाभ उठाएं।
8.     ऐसे दुष्कृत्यों से दूर ही रहें, जो जीवन के अंधेरे को और घना करते हों।
9.     प्रार्थना, जप-ध्यान जैसे आध्यात्मिक उपचारों का सहारा ऐसी अवस्था में कारगर रहता है।
जीवन के प्रवाह को अवरुद्ध करने वाली चट्टान को चटकाने में ये सत्प्रयास हथोड़े की मार जैसे होते हैं, जिनका हर प्रहार अपना काम करता है। शनैः-शनैः चट्टान में दरारें पड़ती हैं और चट्टान को चटकाने वाला अंतिम प्रहार भी एक दिन बन पड़ता है। इसीके साथ जाम पड़ी जीवन की गाड़ी, पटरी पर आ जाती है और जीवन का प्रवाह अपनी लय में बहने लगता है।


Sunday, 20 July 2014

ऐसी प्रभुता मत देना हे स्वामी


ऐसा सुख मत  देना हे प्रभु,
जिससे किसी की जिंदगी बर्बाद हो।

ऐसा धन मत देना, जो हराम का हो ,
ऐसी गुरुता मत देना, जो अर्जित न हो,
ऐसी प्रभुता मत देना, जो कलंकित हो ,
ऐसी महानता मत देना, जिससे अपने लघुता को प्राप्त हों ,

ऐसी ऊँचाई मत देना, जिसका पतन हो,
ऐसा बढ़प्पन मत देना, जिसमें क्षुद्रता हो ,
ऐसी वरिष्ठता मत देना, जो हज़म न हो,
ऐसा चैन मत देना,जिससे अपनों की नींद हराम हो ,

ऐसी प्रभुता मत देना हे स्वामी,
जिससे आप विस्मृत हों।।


Friday, 11 July 2014

नश्वर भटकन के उस पार


कब से तुम्हें पुकार रहा, कब से रहा निहार,

बीत चले युगों-जन्म, करते-2 तुम्हारा इंतजार।
कब सुमिरन होगा वह संकल्प शाश्वत-सनातन,
 कब कूच करोगे अपने ध्येय की ओर महान,

ैसे भूल गए तुम अमृतस्य पुत्र का आदि स्वरुप अपना,

लोटपोट हो नश्वर में, कर रहे अपनी सत्ता का अपमान।

धरती पर भेजा था क्यों, क्या जीवन का ठोस आधार,

क्यों खो बैठे सुधबुध अपनी, यह कैसा मनमाना आचार,
संसार में ही यह कैसे नष्ट-भ्रष्ट हो चले,
आत्मन् ज़रा ठहर करो विचार।

चले थे खोज में शांति-अमृत की,
यह कैसा उन्मादी चिंतन-व्यवहार,
कदम-कदम पर ठोकर खाकर,
नहीं उतर रहा बेहोशी का खुमार

कौन बुझा सका लपट वासना की,
लोभ-मोह की खाई अपार,
अहंकार की माया निराली,
सेवा में शर्तें, क्षुद्र व्यापार।

कब तक इनके कुचक्र में पड़कर,
रौरनरक में झुलसते रहोगे हर बार,
कितना धंसोगे और इस दलदल में,
पथ यह अशांति, क्लेश, गुलामी का द्वार।

बहुत हो गया वीर सब खेल तमाशा, समेट सकल क्षुद्र स्व, मन का ज़्वार,
जाग्रत हो साधक-शिष्य संकल्प में, बढ़ चल नश्वर भटकन के उस पार।



Monday, 7 July 2014

मेरी जंग-ऐ-लड़ाई


ऐ जमाने, ऐ दुनियाँ,
नहीं कोई बड़ी शिकायत-गिला-शिक्वा तुमसे मेरा,
पूरी इज्जत करता हूँ मैं तेरी 
,
तेरे अधिकार, तेरी स्वतंत्रता, तेरी निजता की,
कोई अपमान का ईरादा नहीं है हमारा।

लेकिन झूठ के औचक प्रहार खाकर,
तिलमिला जाता हूँ अभी,
प्रत्युत्तर देना नहीं आता झूठ के स्तर पर गिरकर,
किंतु झूठ का प्रत्युत्तर अपने स्तर से, अपने ढंग से देना,
फर्ज मानता हूँ अपना,
नहीं देना चाहता जिसकी अधिक सफाई।


जानता हूँ नहीं कोई परमहंस भगवान इस जग में,
हर इंसान है पुतला गल्तियों का, अज्ञात से संचालित,
फिर सबकी अपनी अतृप्त इच्छाएं, कामनाएं अधूरी,
चित्त के विक्षोभ, द्वन्द, कुँठा, घाव संग अपनी मजबूरी,
अपने ढंग से उलझा है खुद से हर इंसान, 
हैं सबके अपने गम घनेरे,
और गहरा नहीं करना चाहता हूँ इनको अपने कर्म से।

फिर हर इंसान की अपनी मंजिल अपना सफर,
नहीं किसी से तुलना-कटाक्ष में है बड़ी समझ,
है सबका अपना मौलिक सच, मौलिक झूठ,
चित्त की शाश्वत वक्रता, अंतर की अतल गहराई,
हैं सबके सामने शिखर आदर्शों के उत्तुंग पड़े अविजित,
ऐसे में किसको करुं तलब, किससे माँगू विफलता की सफाई,  

जीवन की पहेली सुलझा रहा हूँ, परत दर परत ,

लड़ रहा हूँ खुद से अपनी लडाई।।


ऐसे में परिस्थितियों के प्रहार अपनी जगह,
चुनौतियों के जवाब अपनी जगह,

लेकिन, इनके स्रोत-समाधान पाता हूँ अंतर में,
खुद से मेरी जंग-ऐ-लड़ाई,
दुनियाँ को जीतने का रखता था ईरादा कभी,
लेकिन खुद को जीतने में समझता हूँ आज भलाई,
अपने तय मानक हैं, शिखर हैं, आदर्श हैं, 
स्व के साथ, स्व के पार कर रहा हूँ जिनका आरोहण,
खुद से है मेरी असल जंग-ऐ-लड़ाई।