Sunday, 19 November 2017

पुस्तक सार, समीक्षा - वाल्डेन



प्रकृति की गोद में जीवन का अभूतपूर्व दर्शन
वाल्डेन, अमेरिकी दार्शनिक, विचारक एवं आदर्श पुरुष हेनरी डेविड़ थोरो की कालजयी रचना है। मेसाच्यूटस नगर के समीप काँकार्ड पहाड़ियों की गोद में स्थित वाल्डेन झील के किनारे रची गयी यह कालजयी रचना अपने आप में अनुपम है, बैजोड़ है। प्रकृति की गोद में रचा गया यह सृजन देश, काल, भाषा और युग की सीमाओं के पार एक ऐसा शाश्वत संदेश  लिए है, जो आज भी उतना ही ताजा और प्रासांगिक है।
ज्ञात हो कि थोरो दार्शनिक के साथ राजनैतिक विचारक, प्रकृतिविद और गुह्यवादी समाजसुधारक भी थे। महात्मा गाँधी ने इनके सिविल डिसओविडियेंस (असहयोग आंदोलन) के सिद्धान्त को स्वतंत्रता संघर्ष का अस्त्र बनाया था। यह थोरो का विद्रोही स्वभाव और प्रकृति प्रेम ही था कि वे जीवन का अर्थ खोजते-खोजते एक कुटिया बनाकर वाल्डेन सरोवर के किनारे वस गए। 
 थोरो के शब्दों में, मैने वन-प्रवास आरम्भ किया, क्योंकि मैं विमर्शपूर्वक जीवन व्यतीत करना चाहता था, जीवन के सारभूत तथ्यों का ही सामना करना चाहता था, क्योंकि मैं देखना चाहता था कि जीवन जो कुछ सिखाता है, उसे सीख सकता हूँ या नहीं। मैं यह भी नहीं चाहता था कि जीवन की संध्या वेला में मुझे पता चले कि अरे, मैंने तो जीवन को जीया ही नहीं। मैं तो गहरे में उतरना चाहता था।
इस उद्देश्य पूर्ति हेतु थोरो मार्च 1845 के वसन्त में वाल्डेन झील के किनारे पहुँच जाते हैं, और अपनी कुटिया बनाते हैं। चीड़ के वन से ढके पहाड़ी ढाल पर अत्यन्त मनोरम स्थान पर वे काम करते, जहाँ से झील का नजारा सहज ही उन्हें तरोताजा करता। झोंपड़ी के आस-पास की दो-ढाई एकड़ जमीन में बीन्स, आलू, मक्का, मटर, शलजम आदि उगाते हैं।

इस वन प्रवास में जंगली जीव उनके साथी सहचर होते। इस निर्जन स्थल पर प्रकृति की गोद में थोरो जीवन के सर्वोत्तम क्षण महसूस करते। जब वसन्त ऋतु या पतझड़ में मेह के लम्बे दौर के कारण दोपहर से शाम तक घर में कैद रहना पड़ता, तो ये थोरो के लिए सबसे आनन्दप्रद क्षण होते। एकांत प्रिय थोरो के अनुसार, साधारणतय संग-साथ बहुत सस्ते किस्म का होता है। हम एक-दूसरे से जल्दी-जल्दी मिलते रहते हैं, इसलिए एक-दूसरे के लिए कोई नई चीज सुलभ करने का मौका ही नहीं मिलता।...कम बार मिलने पर ही हमारी सबसे महत्वपूर्ण और हार्दिक बातचीत हो सकती है।
थोरो की दिनचर्या उषाकाल में शुरु होती। प्रातःकाल की शुद्ध वायु को थोरो सब रोगों की महाऔषधि मानते। अगस्त माह में जब हवा औऱ मेंह दोनों थम जाते और मेघों वाले आकाश के नीचे तीसरे पहर की नीरवता छा जाती तथा पक्षियों का संगीत इस किनारे से उस किनारे तक गूँज उठता, उस समय सरोवर का सान्निध्य सबसे मूल्यवान लगता।

कृषि को थोरो एक पावन कर्म मानते थे। थोरो सुबह पाँच बजे उठकर कुदाली लेकर जाते, दोपहर तक खेत की निंढाई-गुढ़ाई करते और दिन का शेष भाग दूसरे काम में गुजारते। थोरो सादा जीवन, उच्च विचार के हिमायती रहे। उनका वन प्रवास इसका पर्याय था। थोरो के शब्दों में - सैंकड़ों-हजारों कामों में उलझने के बजाय दो-तीन काम हाथ में ले लीजिए। अपने जीवन को सरल बनाइए, सरल। समूचे राष्ट्र की हालत, समुचित ध्येय के बिना दुर्दशाग्रस्त है। इसका एक ही इलाज है - सुदृढ़ अर्थव्यवस्था, जीवन की कठोर सादगी और ऊँचा लक्ष्य। इसके बिना अभी तो मानव बर्बादी के रास्ते पर चल रहा है।
थोरो जंगल प्रवास में हर पल जी भरकर जीए तथा इसी का वे संदेश देते हैं। उनके अनुसार - लोग समझते हैं कि सत्य कोई बहुत दूर की, दूसरे छोर की, दूर तारे के उस पार की । जबकि ये स्थान, काल, अवसर आदि सभी यहीं पर हैं, अभी इसी क्षण हैं। स्वयं ईश्वर का महानतम रुप वर्तमान में ही प्रकट होता है।...हम अपना एक दिन प्रकृति के समान संकल्पपूर्वक बिताकर तो देखें और छोटी-मोटी बाधा से पथ-भ्रष्ट न हों। प्रातः जल्दी उठें और शांत भाव से व्रत रखें। हम यथार्थ की ठोस चट्टानी जमीन पर नींव डालकर स्थिर होकर खड़े होकर तो देखें। जीवन का अर्थ बदल जाएगा। थोरो इस तरह प्रयासपूर्वक अपने जीवन का उत्थान करने की संशयहीन क्षमता को सबसे उत्साहबर्धक चीज मानते थे।

जीवन के सचेतन विकास के लिए थोरो स्वाध्याय पर विशेष बल देते और स्वयं भी ग्रंथों के संग समूचे आध्यात्मिक जगत की यात्रा का लाभ लेते। उनके अनुसार, क्लासिक ग्रन्थ मानव की श्रेष्ठतम संग्रहित विचार पूंजी हैं, इनमें देववाणी निहित है और इनका अध्ययन एक कला है। इनसे कुछ सीखने के लिए हमें पंजों के बल खड़ा होना पड़ता है, जीवन के सबसे जागरुक और सतर्कतम क्षण अर्पित करने होते हैं। थोरो का वन प्रवास बहुत कुछ इसी का पर्याय रहा।
वे नित्य भगवद्गीता के विराट विश्वोत्पत्ति सम्बन्धी दर्शन का अवगाहन करते। उनके शब्दों में, इसके सामने हमारा आधुनिक संसार औऱ साहित्य अत्यन्त तुच्छ और महत्वहीन लगता है। इसकी विराटत्व हमारी कल्पना की अवधारणाओं से भी परे का है। इसके परायण के साथ थोरो वाल्डेन औऱ गंगा के पवित्र जल को आपस में मिलता देखते।

शाकाहर के पक्षधर - विगत सालों में मैंने अनेक बार महसूस किया है कि मैं जब भी मछली मारता हूँ, तो हर बार थोडा-सा आत्म-सम्मान घट जाता है। हर बार मछली मारने के बाद अनुभव किया है कि यदि मैंने यह न किया होता तो अच्छा होता।...मेरा विश्वास है कि जो भी अपनी श्रेष्ठतर मनोवृतियों को उत्तम अवस्था में सुरक्षित रखने का इच्छुक होता है, वह मांसाहार और किसी भी प्रकार के भोजन से बचने की ओर मुड़ता है। फिर, अधिक खाना तो कीट की लार्वावस्था ही में होता है।
सरोवर के तट पर दो वर्ष, दो माह, दो दिन के बाद थोरो यहाँ से विदा लेकर जीवन के अगले पड़ाव की ओर रुख करते हैं। सरोवर के तट पर प्रकृति की गोद में विताए अनमोल पलों को वाल्डेन के रुप में एक कालजयी रचना भावी पीढ़ी को दे जाते हैं, जिसका अवगाहन आज भी सुधि पाठकों को तरोताजा कर देता है।

Tuesday, 7 November 2017

मेरा गाँव, मेरा देश – मौसम सर्दी का और यादें बचपन की




तैयारी पूरी हो तो सर्दी से अधिक रोमाँचक कुछ नहीं


सर्दी का मौसम आ चला। जैसे ही पहाड़ों में बारिश क्या हुई, पर्वत शिखरों ने बर्फ की हल्की सी चादर ओढ़ ली और सर्दी ने दरबाजे पर दस्तक दे दी। जीवन के असली आनन्द का मौसम आ गया। हालाँकि शीत लहर के चलते देश-दुनियाँ में होने वाले नुक्सान के साथ पूरी संवेदना व्यक्त करते हुए कहना चाहूँगा कि यदि सर्दी का इंतजाम पूरा हो तो इससे अधिक रोमाँचक और सुखद शायद ही कोई दूसरा मौसम हो। पतझड़ के साथ आते शिशिर ऋतु के अपने ही रंग हैं, ढंग हैं, मजे हैं और अपने ही आनन्द हैं, जिनको अपने बचपन की यादों के समृद्ध स्मृति कोश से बाहर निकालकर गुदगुदाने की अपनी ही मौज है। अपने बचपन के घर से दूर, बहुत दूर, फुर्सत के पलों में हम इतना तो कर ही सकते हैं।
दशहरा आते ही हमारे गाँव में सर्दी की शुरुआत हो जाती थी, क्योंकि हम ऊनी कोट पहनकर दशहरे के कलाकेंद्र में रात्रिकालीन प्रोग्राम देखने जाया करते थे। दशहरे के ठीक 20 दिन बाद दिवाली तक ठंड़ की मार ठीक ठाक अनुभव होती थी, जिसका स्वागत हम खेतों में तिल के सुखे गट्ठों को जलाकर किया करते थे।


सर्दी की तैयारियाँ समय से पहले ही शुरु हो जाती थी। खेतों में सूखे पेड़ों के तने, जड़ों व ठूँठों पर कुल्हाड़ी से फाड़ कर इन्हें बटोरते। और मजबूत लकड़ी के लिए जंगल की ओर रुक्सत करते। बोन(बाँज) की सूखी लकडियों सबसे मजबूत मानी जाती थी, जिनसे ऊमदा किस्म का कोयला तैयार होता था। इसके साथ कोऊश (अतीश) की लकड़ी आसानी से कट जाती थी। सुबह भौर होते ही किल्टा और कुल्हाड़ी लेकर हम परिवार के बड़े-बुजुर्गों व भाईयों के संग जंगल जाया करते। सूर्योंदय तक घर बापिस हो जाते। इसके साथ युवाओं की टोली बीहड़ बन की गहराईयों में सूखे चील-देवदार-कैल आदि के सीधे, सूखे तनों को गेल(लम्बे लट्ठे) बनाकर इनको कुंदे व रस्सी में बाँधकर दरघीश (लट्ठों को घसीटने का बना मार्ग) से होकर घसीटकर घर तक लाते। ग्रामीण युवाओं के बीच इसका एक अलग ही रोमाँच रहता।
 जैसे-जैसे हम पहाड़ी में ऊपर चढ़ते, घर-गाँव की छतों पर छाया धुआँ घरों में जल रहे चूल्हों व पक रहे भोजन की चुग्ली करता। यह धुआँ लोकजीवन का सहज हिस्सा था, जिसका आज के दमघोंटू प्रदूषण से कोई वास्ता नहीं था। घर में सुलग रहे तंदूर में लकड़ी के टुकडों का हवन होता। इनके सुलगते टुकड़ों की गर्मी तंदूर की चादर से विकरित होकर कमरे के हर कौने को गर्म रखती। तंदूर पर पानी का बर्तन गर्म होता रहता, जिससे बीच-बीच में हॉट ड्रिंक की व्यवस्था होती रहती। गैंहू, मक्का, सोयावीन की धाणा (पॉपकोर्न) भूनना ऐसे में प्रिय शग्ल रहता। इसे गुड़ व अखरोट के साथ खाने का अपना ही मजा रहता। ठंड ज्यादा होती तो, चाय-पकौड़ी का विशेष इंतजाम रहता।

बैसे सेब, प्लम की प्रूनिंग से कटी टहनियाँ देशी चूल्हे के लिए आदर्श ईँधन रहतीं। इसके साथ कोहू, बोन(बाँज) जैसी हरि पत्ती वाली लकड़ियाँ भेड़-बकरियाँ के चरने के बाद आँगन के किनारों पर सूखने के लिए ढेर लगाकर रखी जाती। खुले चूल्हे के लिए ये बेहतरीन ईँधन साबित होती।

सर्दी का असली नजारा बर्फवारी के साथ शुरु होता। तापमान जमाब बिंदु के आसपास आ गिरता। पहाड़ियों व सामने के ऊँचाई पर बसे गाँव तक बफ गिरने के साथ घाटी का नजारा कुछ ओर रहता। सुबह हिमाच्छाति ध्वल शिखर से स्वर्णिम सूर्योदय सदैव दिव्य भाव झंकृत करता। घर-गाँव में बर्फ गिरने पर तो जीवन तंदूर के ईर्द-गिर्द सिमट जाता, क्योंकि बाहर कोई खास काम नहीं रहता। लोकजीवन इन पलों में जैसे ठहर सा जाता, कमरों तक सीमित हो जाता। बड़े बुजुर्गों से कथा कहानी सुनना, पहेली बुझाना ऐसे में पसंदीदा टाइमपास काम रहते। बच्चों की आपसी उछल-कूद के साथ घर में भेड़-बकरी के मेंमनों के बाढ़े में घुसकर उनके बीच खेलना रुचिकर काम रहते। (उस बक्त कैमरा एक दुर्लभ यंत्र था, अतः किन्हीं फोटो के साथ अनुभव शेयर करना संभव नहीं)


आंगन में पत्थर के ऊखलों में पानी की मोटी परत जमी रहती, जिनके शुभ दर्शन सुबह-सुबह होते। रास्ते में पानी के स्रोतों के पास बर्फ की मोटी परतों को डंडे या पत्थरों से तोड़कर सीसे के आकार के टुकडों से खेलते। घास पर औंस की जमीं बूंदें राह में स्वागत करती। पूरा खेत जैसे पाले की एक हल्की सफेद चादर ओढ़े दिखता। ठंड के चर्म पर पानी के नल जम जाते। रात को इनसे झरती पानी की बूंदें सुई का रुप लेकर नल से लटकती दिखती। जैसे ही सूर्योदय होता, जमी बर्फ की परत पिघलना शुरु होती। पूरे खेत व रास्ते में कीचड-कीचड़ हो जाता।

 

परीक्षा के दिनों में तंदूर से हटकर बाहर बरामदे में ठंड़ में पढ़ने का ऱोमाँच कुछ ओर ही रहता। दिन को छत पर धूप में बैठकर खेत व वादी का विहंगावलोकन करते हुए पढ़ना एक अलग ही अनुभव था। दोपहर शाम को खेत में किसी चट्टान या मखमली घास पर आसन जमाकर एकांत में अध्ययन का अपना ही आनन्द रहता।
धान की पुआल से माँदरी (चटाई) बनने की कबायत चलती। गाँव के हर घर में प्रायः महिलाओं को दिन की धूप में इसको बुनते व्यस्त देखा जा सकता था। घर के एक कौने में बने हथकरघे में पट्टू व ऊनी कम्बल तैयार होते। फुर्सत के समय में महिलाएं ऊन की जुरावें, दस्ताने व स्वाटर बुनने में मश्गूल रहती। तब घर में भेड़-बकरियाँ बहुतायत में थी, ऐसे में बुजुर्गों को इनकी ऊन को तकली से कातते देखते, जो आज किन्हीं बिरले घरों तक सीमित हैं। 


घर की छत्तों पर रंग-विरंगे कद्दू सूखने के लिए रखे होते, जो अपना ही रंग बिखेरते - लाल, हरे, पीले व भूरे। जापानी फल के पीले पत्ते वाले पेड़ बहुत सुंदर लगते। इसी तरह खनोर(चेस्टनेट) के बड़े-बड़े पेड़ पीले आच्छादन के साथ अपना रंग बिखेरते।
ठंड में धूप का अलग ही आनन्द रहता। सुबह की ठंड में अकड़ी नस-नाडियाँ जैसे बाहर आंगन में धूप सेकते ही खुल जाती, चैतन्य हो उठती। इसके साथ गाँव का नाला व ब्यास नदी का निर्मल जल हिमालयन टच लिए रहते। ब्यास नदी के किनारे बिहाल (विहार) में अतीश के सूखे पत्ते बटोरने का क्रम खूब चलता। सुबह व शाम को गाँव की महिलाओं व बच्चों को किल्टों में बटोरकर इनकी पुआली को ले जाते देख सकते थे। नदी के किनारे कूल्हों(पानी की छिछली धार) में मछली पकड़ने का खेल खूब चलता। बच के दलदल में बनमुर्गी को पकड़ने की कसरत, अपने पसंदीदा खेलों में शुमार रहता।


पतझड़ के कारण सेब, अखरोट, खुमानी से लेकर अतीश के पेड़ अस्थि पंजर से खड़े दिखते। इनकी विरलता के बीच गाँव, घाटी पर ब्यास नदी के उसपार आईटीबीपी कैंप का नजारा स्पष्ट दिखता। सूखते पीले पत्ते, बगानों को पीले रंग से पोत देते। घाटी में पीले, हरे व भूरे पैच प्रकृति के कैन्वास पर उस अदृश्य जादूगर की कारीगरी की बेमीसाल झलक देते और जब आसमान में बादल भी रंग बिरंगे व नाना आकार के उमड़ते-घुमड़ते दिखते, तो नजारा कुछ ओर ही रहता।


घास के टूहके सूखे मक्का की घास से लदे रहते। इसमें कौओं द्वारा छुपाए अखरोटों का जखीरा बच्चों को खूब भाता। पेड़ में बचे अखरोट सूखकर खुद व खुद गिरते रहते, जिनको बटोरना अपने आप में एक सुखद अहसास रहता। जो सूखे अखरोट छिलकों से झांक रहे होते, उन पर पत्थर से निशाना लगाने की होड़ बच्चों में लगी रहती। इसी के बीच फूलों के नाम नरगिस का फूल अपनी ध्वल फूल पतियों के बीच सोने के कटोरे को समेटे हवा में मादक सुगन्ध बिखेरने लगता। इसी के साथ शिशिर के समाप्न व बसन्त के शुभ आगमन का संकेत मिलता। अब पूरी शीतऋतु में तपस्वियों सा वेश धारण किए, शीत निद्रा में सोए तमाम वृक्ष एवं पेड़-पौधे कलियों में सिमटे पुष्पों के साथ वसन्त के स्वागत के लिए तैयार होते।

Saturday, 21 October 2017

प्रकृति-पर्यावरण : वर्तमान पर्यावरण संकट एवं समाधान की दिशा



समस्या विकराल, बनें हिस्सा समाधान का
पर्यावरण संकट के दौर का अभिशप्त जीवन - आज हम पर्यावरण संकट के विषम दौर से गुजर रहे हैं। पर्यावरण का हर घटक, चाहे वह जल हो या वायु, थल हो या नभ – हर कौना प्रदूषण की गंभीर मार से त्रस्त है। महानगरों एवं औद्योगिक क्षेत्रों में तो इसकी विकरालता अपने चरम पर है, जिसे भुक्तभोगी ही समझ सकता है। यहाँ की एक बड़ी आबादी इसके दमघोंटू वातावरण के बीच जीने के लिए अभिशप्त है, जो चिंता का विषय है, विचारणीय है। इसका प्रसार तेजी से शहरों व कस्वों में हो रहा है। नजदीक के गाँव भी इसकी चपेट में आ रहे हैं।
ऐसे क्षेत्रों की नदियों को देखें, अधिकाँशतः गंदे नालों में तबदील हो चुकी हैं। जहाँ से भी ऐसी नदियाँ गुजरती हैं, इनके साथ मिलते खेतों में प्रयुक्त होने वाले विषैले रसायन, कीटनाशक भूमि के साथ भूमिगत जल को भी दूषित कर रहे हैं। इसके किनारे की आबादी कैंसर जैसे गंभीर रोगों के साथ जीने के लिए अभिशप्त है। हवा में नित्य घुलता जहर सांस सम्बन्धी कितने रोगों का कारण बन रहा है।
विक्षिप्तता की ओर ले जाता महानगरीय जीवन - बढ़ते प्रदूषण के कारण महानगर अपने दमघोंटू वातावरण के साथ गैस चेम्बर का रुप ले चुके हैं। उस पर ध्वनि प्रदूषण मिल जाने पर महानगरों का पर्यावरण एक स्वस्थ व्यक्ति को भी विक्षिप्तता की ओर ले जाने वाला सावित हो रहा है। विक्षिप्तता के इस माहौल में मनोरोग, अपराध एवं सामाजिक विघटन की घटनाएं बढ़ रही हैं, जो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
समाधान के प्रयास एवं मूल कारण की खोज - ऐसे में, पर्यावरण प्रदूषण को ठीक करने के तमाम प्रयास चल रहे हैं। वैज्ञानिक नए अनुसंधानों के साथ, तो राजनेता नए कानूनों के साथ और बुद्धिजीवी तमाम सेमीनार-गौष्ठियों, नीति निर्माण एवं शोधपत्रों के माध्यम से इसके समाधान में जुटे हैं। इस सबके बावजूद पर्यावरण प्रदूषण का संकट और विकराल रुप लेता जा रहा है। पर्यावरण संकट के आत्यांतिक समाधान के लिए लिए इंसान को इसके मूल तक उतरना होगा, जो सीधे प्रकृति के साथ इंसान के सम्बन्धों पर टिका हुआ है।
प्रकृति की गोद में सभ्यता-संस्कृतियों का उद्भव-विकास - वस्तुतः पर्यावरण प्रकृति का ही स्थूल घटक है। प्रकृति से इंसान का कैसा सम्बन्ध है, इससे पर्यावरण  की स्थिति निर्धारित होती है। जब तक इंसान का प्रकृति के साथ स्वस्थ व सामंजस्यपूर्ण सम्बन्ध रहा, पर्यावरण स्वच्छ एवं संतुलित रहा। प्रकृति की गोद में ही तमाम सभ्यताओं का उद्भव हुआ और संस्कृतियां विकसित हुई।
विश्व की प्राचीनतम संस्कृति के प्रतिनिधि विचारशील ऋषि-मुनि प्रकृति की छत्र-छाया में वन अरण्य में विद्यार्जन करते हुए जीवन के सूत्रों की खोज करते रहे। जीवन के रहस्यों पर गहन चिंतन-मनन करते हुए जीवन की रीति-नीति का शाश्वत दर्शन व दिशा बोध (सनातन धर्म) दे गए।
प्रकृति के प्रति पूजनीय एवं श्रद्धास्पद भाव - प्रकृति के साथ स्वस्थ, श्रद्धास्पद एवं सहयोगात्मक संबंध में ही वैदिक ऋषियों ने मनुष्य के सुख शांति एवं कल्याण का मर्म देखा। यज्ञ जैसी विधा को संस्कृति के केंद्र में रखकर प्रकृति के प्रति पूजनीय एवं श्रद्धास्पद भाव को बनाए रखा, जो आज भी कुछ अंशों में सांस्कृतिक संस्कारों के रुप में विद्यमान है। प्रकृति के हर घटक के प्रति सम्मानीय एवं पूजनीय भाव इसकी मौलिक विशेषता रही।
विज्ञान एवं विकास के उन्माद में बिगड़ता संतुलन - किन्तु आधुनिक युग में पश्चिम में उठी भौतिकवाद की आँधी ने मानवीय आस्था एवं सोच में उलटफेर कर दिया। धर्म का स्थान विज्ञान ने ले लिया और प्रकृति के प्रति आस्था भाव खोता गया। संस्कृति, विकृति का शिकार हो चली व मानव और प्रकृति के मधुर रिश्ते खत्म होते गये। अपने विकास के उन्माद में विज्ञान प्रकृति पर विजय प्राप्त करने का दंभ भरने लगा और अपने को उसके पुत्र व सहचर का रिश्ता भूल गया।

विज्ञान का उपयोगितावादी दृष्टिकोण एवं पर्यावरण चेतना का लोप - प्रकृति से जो आत्मीय भाव था, वह आस्था की कमी के कारण बेचैनी, प्रतियोगिता, उपभोक्तावादिता और आक्रामकता में बदल गया। विज्ञान प्रकृति को उपयोगितावादी दृष्टि से देखता है। परिणाम स्वरूप प्रकृति के प्रति इसमें उस जीवन दर्शन का सर्वथा अभाव है जो उसमें श्रद्धास्पद भाव रखता हो। प्रकृति के प्रति उस सौंदर्य बोध के भी दर्शन नहीं होते, जो प्रकृति के सान्निध्य में शांति, आनन्द और रचनात्मकता से भरी सृजनशीलता का प्रेरक बन सके।
भौतिक चिंतन एवं भोगवादी जीवन दर्शन के चलते इंसान पहले से अधिक लोभी एवं स्वार्थी हो गया है। इसके साथ पर्यावरण चेतना का भी लोप हो गया है, जो अपने परिवेश व इसके अभिन्न घटकों, वृक्ष-वनस्पतियों, जीव-जन्तुओं व नदी-तालाबों एवं पर्वत-मरूस्थल में भी आत्मीय भाव का आरोपण कर सके।
पर्यावरण संरक्षण के सशक्त सांस्कृतिक आधार - जबकि आज भी देश के ग्रामीण आंचलों में ऐसे सांस्कृतिक पॉकेट मौजूद हैं, जहाँ वृक्षों की पूजा की जाती है, देवताओं के नाम पर अर्पित बनों का सहज रुप में संरक्षण हो रहा है। नदियों और पर्वतों को पूजनीय मानकर इनके संरक्षण की प्रक्रिया जारी है। यहाँ तक कि जीव-जंतुओं के प्रति भी आत्मीय भाव जीवित है, जिसके चलते पर्यावरण संरक्षण की सशक्त सांस्कृतिक परम्परा पीढ़ी दर पीढ़ी प्रवाहमान है।

प्रकृति का अतिशय दोहन एवं आपदाओं की मार - लेकिन अपने सांस्कृतिक जड़ों से कटे प्रभावशाली जनसमूह के कारनामों की परिणति भयावह है। यहाँ प्रकृति के अतिशय दोहन से पर्यावरण संतुलन डगमगा रहा है व जिसकी परिणति बाढ़, भूकम्प, भूस्खलन, अतिवृष्टि, अकाल, सुनामी लहरों, तेजाबी वर्षा जैसी प्राकृतिक आपदाओं के रूप में कहर बरसा रही है।
पर्यावरण विघटन के साथ व्यक्तित्व विघटन एवं समाधान की तलाश -इस पर्यावरण असंतुलन से मानवी अंत:करण भी अछूता नहीं है। आुधनिक शोध अध्ययन बढ़ते मनोरोगों, मनोविक्षिप्तता एवं व्यक्तित्व विघटन के मूल में प्रकृति एवं पर्यावरण असंतुलन को एक प्रमुख कारक के रूप में पा रहे हैं। मानव और प्रकृति-पर्यावरण के बीच फिर से स्वस्थ एवं मधुर सम्बन्ध कैसे स्थापित हो? इस यक्ष प्रश्र को लेकर पर्यावरणविद् एवं विचारशील समुदाय चिंतनरत् हैं।
पर्यावरण संकट के विषम दौर में बनें समाधान का एक हिस्सा - प्रकृति और मानव में एकता लाये बिना, इनके सम्बन्धों को पुन: आत्मीय बनाये बिना न तो मानवीय अस्तित्व सुरक्षित रह पायेगा और न ही इसके विकास के साथ स्थायी सुख, शांति व समृद्धि का स्वप्र पूरा हो सकेगा। प्रस्तुत पर्यावरण संकट का समाधान प्रकृति के प्रत्येक घटक के प्रति स्वस्थ एवं संवेदनशील व्यवहार एवं उपयोग से जुड़ा हुआ है, जिसे हर विचारशील इंसान को अपने स्तर पर निभाना होगा और दूसरों को भी इसके प्रति सचेष्ट करना होगा। हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि पर्यावरण संकट के इस विषम दौर में कहीं हम विकाराल रुप ले रही इसकी समस्या का हिस्सा तो नहीं हैं।